एससी-एसटी एक्ट पर भगवान के गलत फ़ैसले!

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पिछले कुछ दिनों से भाजपा समर्थक ‘भक्त’ सोशल मीडिया पर लगातार इस तरह की अफवाहें फैला रहे हैं कि नोटा दबाने से कांग्रेस को फायदा होगा और देश में हिन्दुओं का जीना मुश्किल हो जाएगा। तमाम कहानियों और किस्सों में लपेटकर जनता को बरगलाने की कोशिश हो रही है कि सवर्ण यदि नोटा दबाएंगे तो मानो देश से हिन्दुओं का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। हज़ार दलीलें ‘भक्तों’ के पास है, लेकिन एससी-एसटी एक्ट पर भगवान के गलत फ़ैसले के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत उनमें नहीं है। यह कुतर्क भक्तों द्वारा दिया जा रहा है कि यह एट्रोसिटी कानून कांग्रेस लेकर आई थी|

तब सवर्णों ने विरोध क्यों नहीं किया,  लेकिन भक्त यह भूल जाते हैं कि क्या इस काले कानून का तब भाजपा ने विरोध किया था, जब देश के सुप्रीम कोर्ट ने अपने विवेक से सही निर्णय सुना दिया था कि ऐसे मामलों पर तत्काल गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए तो केंद्र को बीच में कूदने की क्या पड़ी थी? केंद्र सरकार का यही काम बचा है क्या कि वोटों की खेती करने के लिए कानून की धज्जियां उड़ाई जाए? सरकार के दोहरे रवैये का आलम देखिए कि जिस राम मंदिर के नाम पर ये सत्ता में आते हैं उन्हीं रामलला के मंदिर निर्माण पर प्रश्न पूछने पर बेशर्मी से सत्तासीन कह देते हैं कि यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है इसलिए हम कुछ नहीं कर सकते? सवाल है कि यह काला कानून भी तो सुप्रीम कोर्ट ने बदला था, तब आपको अचानक तकलीफ क्यों होने लगी? वोटों की फसल बिगड़ते देख तत्काल अध्यादेश लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ही पलट दिया और किसी राजनीतिक दल ने इसका विरोध नहीं किया आखिर क्यों?

राम मंदिर निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट में केस चलने की दलील और वोट बटोरने के लिए उसी कोर्ट के निर्णय का मखौल उड़ाना आज की राजनीति में दोहरे रवैये का शानदार उदाहरण है। केंद्र सरकार सहित सभी राजनीतिक दल इस मुद्दे पर सवालों के घेरे में हैं क्योंकि सभी जानते हैं कि इस कानून का दुरुपयोग होता है, लेकिन वोटबैंक खिसकने के डर से उनके मुंह पर ताले लटक जाते हैं। ‘पार्टी विथ डिफरेंस’ का दावा करने वालों का असली चेहरा यही है? कांग्रेस भी बताए कि सवर्ण और पिछड़े भी इस देश के नागरिक हैं या नहीं?  जनता भी वोटबेंक का यह खेल अच्छे से समझ रही है और इसीलिए पहली बार इस कानून पर भाजपा-कांग्रेस सहित सभी दल के नेता अब निशाने पर आ गए हैं। मध्यप्रदेश के दिग्गज कांग्रेस नेता कमलनाथ और केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर दोनों को काले झंडे दिखाकर नारेबाजी की गई। इनके अलावा मध्यप्रदेश के कई मंत्रियों को भी काले झंडे दिखाने की कोशिश की गई। मंदसौर में आज सपाक्स संगठन द्वारा इस कानून के खिलाफ विशाल रैली निकाली जाने वाली है, जिसे जनता का भरपूर समर्थन भी मिल रहा है।

कमाल की बात है कि भारत में अप्रवासी रोहिंग्या घुसपैठियों से लेकर अवैध बांग्लादेशियों के पक्ष में भी नेता और बुद्धिजीवी बोलते दिखाई दे जाते हैं। आतंकवादियों का केस लड़ने और उनका पक्ष रखने के लिए भी देश में समझदारों की कमी नहीं है, लेकिन विडम्बना देखिए कि एट्रोसिटी एक्ट जैसे काले कानून पर सवर्ण और पिछड़ों के साथ खड़ा होने के लिए कोई नेता, बुद्धिजीवी तैयार नहीं है। सोशल मीडिया के भक्त यह बात समझ लें कि सवर्ण और पिछड़ों के साथ हो रहे इस भेदभाव को हिंदुत्व नाम लेकर दबाया नहीं जा सकता। जो बात गलत है, उसका विरोध होना ही चाहिए। कांग्रेस और मुस्लिम राष्ट्र का भय दिखाकर एट्रोसिटी एक्ट को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। नोटा के समर्थन में चल रही मुहिम को मिल रही सफलता का ही असर है कि नेताओं और राजनीतिक दलों में उथल-पुथल मची हुई है। इस एक्ट पर सभी दलों की एकजुटता यही दिखाती है कि समाज को तोड़ने में राजनीतिक दल ही सबसे आगे हैं। एट्रोसिटी एक्ट भी समाज को तोड़ने वाला एक घातक कदम है, जिसका पुरजोर विरोध किए जाने की ज़रूरत है।

-सचिन पौराणिक

 

 

 

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