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Talented View : …तो साध्वी प्रज्ञा का विरोध करने का उन्हें कोई नैतिक हक नहीं

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कहते हैं कि बातचीत का असली मकसद वह जानना होता है, जो दरअसल कहा ही नहीं गया क्योंकि इंसान का स्वभाव होता है चीजों को घुमा-फिराकर कहने का। जो वाकई में कहना होता है या कहने की जो असल बात होती है वह कहीं नहीं जाती सिर्फ समझी ही जा सकती है, लेकिन अनकही बातों को समझना सबके लिए आसान नहीं होता। कई लोगों का बौद्धिक स्तर इतना नीचे होता है कि अनकही बातें समझना तो दूर वे स्पष्ट कही गई बातों तक को वे नहीं समझ पाते।

Talented View : “चौकीदार चोर है” का जवाबी नारा शायद हो गया तैयार

खैर, अभी बात को आगे न घुमाते हुए मुद्दे पर आ जाते हैं। जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती ने आतंकी संगठनों से अपील की है कि वे रमजान के पवित्र महीने में खून-खराबा न करें। इसके साथ ही महबूबा ने भारत सरकार से भी गुजारिश की है कि आतंकियों के खिलाफ चलाए जा रहे ऑपरेशन को एक महीने के लिए रोक दिया जाए। रमज़ान का महीना अल्लाह की इबादत का होता है इसलिए कम से कम एक महीने के लिए सैन्य कार्रवाई और सर्च ऑपरेशन रोक दिए जाएं,  लेकिन महबूबा की बयान का डीएनए किया जाए तो इससे चौंकाने वाले खुलासे हो सकते हैं।

पहली बात महबूबा का आतंकियों से यह कहना कि एक महीने खून-खराबा न किया जाए, का स्पष्ट मतलब है कि एक महीने बाद आप खून बहाने के लिए स्वतंत्र हैं| सरकार से संघर्ष विराम की अपील का भी साफ मतलब है कि इस दौरान आतंकियों को इबादत के नाम पर आगे हिंसा की तैयारी करने की खुली छूट दी जाए, जिससे एक महीने आतंकी असलहे इकट्ठा कर ले, अपना नेटवर्क बना ले और आगे के हमलों की अच्छे से प्लानिंग कर ले। रमज़ान के बाद हमलों पर महबूबा को कोई परहेज़ भी नहीं है, लेकिन महबूबा शायद यह समझ नहीं रही है कि उनके ऐसे बयान सिर्फ आतंकवाद के मजहब को देश के सामने उजागर कर रहे हैं।

Talented View : जनता को इनके मंसूबे कामयाब नहीं होने देने चाहिए

यदि आतंकवादी मुस्लिम नहीं हैं तो फिर क्यों रमज़ान के महीने में उनसे हिंसा न करने की अपील की जा रही है?  यदि आतंकियों का धर्म कुछ और होता तो ये संघर्ष विराम नवरात्रि, पर्युषण या फिर गुड फ्राइडे वाले सप्ताह में नहीं किया जाता? आतंकवादी तो इस्लाम को बदनाम कर ही रहे हैं किंतु महबूबा जैसे नेता क्या इस्लाम को और ज्यादा बदनाम नहीं कर रहे हैं? मुस्लिम समाज को एकजुट होकर महबूबा के बयान का विरोध नहीं करना चाहिए ? आतंकवादी इतने पत्थर दिल होते हैं कि कभी वे सोते हुए सैनिकों की जान ले लेते हैं (उरी) तो कभी अपनी ड्यूटी पर जा रहे फौजियों को निशाना बना लेते हैं (पुलवामा) तो कभी बेकसूर तीर्थयात्रियों (अमरनाथ यात्रा) को ही मौत की नींद सुला देते हैं।

ऐसे शैतानों पर दया दिखाने की कोई ज़रूरत है ? जो रोज़ ही मानवता को शर्मसार कर रहे है, उन पर मानवता दिखाने से हमें कुछ हासिल होगा? हमारे देश की बर्बादी का ख्वाब देखने वाले इन शैतानों को हर मौके पर, चाहे वो रमजान हो या ईद, गोली के अलावा कुछ और मिलना चाहिए?  महबूबा जैसी पाकिस्तान परस्त, बेशर्म नेता से देश उम्मीद ही क्या कर सकता है? ये नेता देश के साथ ही अपने मजहब के भी दुश्मन हैं। इस्लाम को अपने भीतर छिपे इन दुश्मनों को पहचानना होगा और इनका पुख्ता विरोध करना होगा नहीं तो ये आतंकवादी और इनके सरपरस्त नेता इस्लाम को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। महबूबा ने इशारों-इशारों में आतंक का मजहब बता दिया है। अब ये देश के मुसलमानों को तय करना है कि वे उनके मजहब को बदनाम करने वाले नेताओं का विरोध करते हैं या मौन रहकर उनका समर्थन करते हैं ? यदि महबूबा का विरोध करने की हिम्मत देश के मुसलमान नहीं जुटा पाते हैं तो साध्वी प्रज्ञा जैसे नेताओं का विरोध करने का भी उन्हें कोई नैतिक हक नहीं बचता।

बुर्के की आड़ में…

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