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Talented View : देश की न्याय व्यवस्था का यूं मज़ाक न बने

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हमने वह कहानी सुनी ही है, जब एक बार शिक्षक को ट्रैफिक सिग्नल तोड़ने के केस में जज के सामने पेश होना पड़ता है। संयोग से जज उन शिक्षक महोदय का ही पढ़ाया हुआ छात्र निकल आता है। अपने शिक्षक को सामने देखकर उसे स्कूली जीवन की तमाम बातें अचानक याद आ जाती है। वह मुस्कुराकर अपने शिक्षक को आदेश देता है कि आपकी सज़ा है कि कागज पर सौ बार लिखें कि आज के बाद ट्रैफिक सिग्नल नहीं तोडूंगा।

इस तरह की कहानियां हमें बेहद आकर्षित करती हैं कि कैसे एक शिक्षक को उनके ही अंदाज़ में सज़ा दे दी गई, लेकिन यह भी सच है कि इस तरह की मनोहर कहानियां सिर्फ सुनने में अच्छी लगती हैं। न इन कहानियों में कोई वास्तविकता होती है और न ही ये व्यावहारिक होती हैं, लेकिन हाल ही में कोर्ट द्वारा ऐसा ही एक फ़ैसला सुनाया गया है, जिसे देखकर लगता है कि जज साहब ने ऐसी कहानियों को कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले लिया है।

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रांची की एक छात्रा ऋचा पटेल उर्फ भारती को एक मामले में कोर्ट ने ऐसी ही बेवकूफ़ाना सज़ा सुनाई है। कथित तौर पर धार्मिक भावनाएं आहत करने के एक मामले में कोर्ट ने ऋचा को जमानत के लिए कुरान की 5 प्रतियां बांटने का आदेश सुनाया है। इस तुगलकी फरमान की चारों तरफ निंदा हो रही है। समझ नहीं आता कि ये जज साहब न्याय पालिका की इज़्ज़त मिट्टी में मिलाने पर क्यों तुले हुए हैं ? जज साहब किस आधार पर ऐसी सज़ा सुना रहे हैं, यह राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन चुका है? सोशल मीडिया पर लोग इस फैसले के खिलाफ खुलकर बात कर रहे हैं ।

सवाल उठ रहा है कि ऋचा को धार्मिक भावनाएं भड़काने के जुर्म में कुरान बांटने जैसा दकियानूसी आदेश किस आधार पर दिया जा सकता है? “टिक-टोक” जैसे एप्स पर हजारों वीडियो मिल जाएंगे, जिनमें हिंदुओं के खिलाफ जहर उगला जा रहा है। फैज़ल और एज़ाज़ खान जैसे लोगों द्वारा सोशल मीडिया के हर मंच से हिंदुओं को धमकियां दी जा रही हैं। इनकी बातें सिर्फ हिंदुत्व के विरोध तक सीमित न रहकर देशद्रोह तक पहुंच रही हैं। सोशल मीडिया पर धार्मिक भावनाएं आहत करने वालों की तादाद लाखों में है, लेकिन जज साहब का हथौड़ा सिर्फ ‘सेलेक्टिव’ मुद्दों पर ही चलता है। अगर किसी ने गलती की है तो उसे कानून के अनुसार सज़ा मिले, सभी को मिले, इसमें कोई विरोध नहीं है, लेकिन सज़ा के नाम पर पुनः धार्मिक भावनाएं भड़काई जाएं, ये कोई समझदारी है?

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सारे जज अगर ऐसे ही सज़ा देने लग जाएंगे तो हिन्दू भावनाओं का अनादर इतनी दफा हो चुका है कि देशभर में करोड़ों गीता, रामायण, महाभारत और उपनिषद बंटवाने पड़ जाएंगे। अगर ऐसे ही इंसाफ करना है तो पहले जज आरोपी से पूछेंगे कि बताओ तुमने कौन से भगवान का अपमान किया है? आरोपी कहेगा-हनुमानजी। तब जज कहेंगे कि तुम्हें जमानत चाहिए तो मंगलवार के दिन 100 पुस्तकें सुंदरकांड और हनुमान चालीसा की मंदिर में वितरित करो। अगर दुर्गाजी का अपमान किया है तो दुर्गा सप्तशती की पुस्तकें वितरित करो। ईसाइयों की भावना आहत हुई तो आरोपी से बाइबल बंटवाओ।

देश में इसी तरह इंसाफ होने लगेगा तो हर कोर्ट के बाहर “गीताप्रेस गोरखपुर” की दुकानें खुल जाएंगी। दुकान पर हर धर्म की किताबें उपलब्ध रहेंगी औऱ बाहर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा जाएगा, “धार्मिक भावनाएं भड़काने के आरोपी को ये पुस्तकें थोक में खरीदने पर लागत मूल्य पर उपलब्ध करवाई जाएंगी।” इस तरह कोर्ट के बाहर ही जज साहब के आदेश का तुरन्त पालन करवा दिया जाएगा। देश की न्याय व्यवस्था का मज़ाक उड़ाया जाता है तो ऐसे जज भी इसके लिए बराबर के भागीदार हैं।

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कोर्ट इंसान जाता है न्याय के लिए, लेकिन न्याय की जगह उसके साथ ‘मज़ाक ‘ करने की ये नई परंपरा शुरू होने लगी है। सुप्रीम कोर्ट को इस विषय का संज्ञान लेना चाहिए और ऐसे जजों पर कार्रवाई करनी चाहिए, जिससे देश की न्याय व्यवस्था का यूं मज़ाक न बने।

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