Talented View : हिन्दू अपने मुगालतों से बाहर निकलें

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आज के दिन (Talented View On Christmas 2018 ) सुबह उठते ही हर बच्चे के चेहरे पर एक मुस्कान है। हर बच्चे को तकिये के नीचे उपहार रखा हुआ मिला है। बच्चा खुश है और उसका विश्वास सांता क्लॉज़ पर दृढ़ हो रहा है। कल ही तो उसने स्कूल के सभी बच्चों के साथ चर्च जाकर कुछ चॉकलेट की मांग की थी और सांता ने रात को ही आकर उसकी मांग पूरी भी कर दी। बच्चा सोच रहा है कि अब से हर चीज़ सांता से ही मांगनी है क्योंकि सिर्फ वही उसकी सुनते हैं। ऐसा सिर्फ क्रिश्चियन बच्चों के साथ नहीं बल्कि हर धर्म-मज़हब के बच्चों के साथ होता है।

गांव, शहर, प्रान्त, देश और दुनिया के हर देश में इसलिए क्रिसमस का पर्व बच्चों के बीच खासा प्रिय हो चला है। शहरों की बात करें तो यहां उत्साह में कोई कमी वैसे ही नहीं रहती है। स्कूल से लेकर मॉल और दुकानों से लेकर चौराहों तक हर जगह सांता ही सांता दिखाई देते हैं। बच्चों को भी स्कूल में आजकल दीवाली से ज्यादा छुट्टियां क्रिसमस की दी जाने लगी हैं, जिससे स्वाभाविक तौर पर उन्हें इस त्यौहार का इंतज़ार रहता है। क्रिसमस की छुट्टियां अंग्रेजी नए साल तक लगातार चलती हैं। बच्चों के मन में बचपन से ही सांता के प्रति एक अलग भाव जग जाता है, जो उन्हें बड़ा होकर ईसाइयत के प्रति आकर्षण पैदा करता है। चारों तरफ “मेरी क्रिसमस” के शोर में बाकी धर्मों के कट्टर धर्मावलम्बी यह सोचने पर विवश हो जाते हैं कि आखिर हमारे बच्चे क्यों इस त्योहार के प्रति दीवाने हो रहे हैं?

आंकड़ो की बात करें तो भारत मे मुस्लिमों और ईसाइयों की तादाद बड़ी है। ये दोनों धर्म अपने विस्तार पर विश्वास रखते हैं, जबकि बाकी धर्म जैसे हिन्दू, जैन, बौद्ध, यहूदी और पारसी कभी विस्तार पर भरोसा नहीं करते। हिंदुओं सहित अन्य धर्मों के विघटन की यही सबसे बड़ी वजह है। मुस्लिम आक्रान्ताओं ने देश की एक बड़ी आबादी का धर्म परिवर्तन कराया और अब भी कुछ वैसे ही तरीकों से मुस्लिम संस्थाएं इन कामों में लगी हुई है।

जाकिर नाइक जैसे कट्टर लोगों ने भी इसी काम को भारत में गति दी थी, लेकिन ईसाइयत की बात करें तो इनकी आबादी बढ़ने के पीछे मार्केटिंग की तकनीक का ज्यादा इस्तेमाल दिखाई देता है। ये लोग वंचित, पिछड़ों, आदिवासी, वनवासियों के बीच जाकर सेवा करते है और बदले में उनका धर्म परिवर्तन करवा दिया जाता है। अनपढ़ बच्चों के गले मे क्रॉस पहनाकर उन्हें ईसाई बनाया जा रहा है तो कुछ रोगियों का एक डिस्प्रिन की गोली के बदले भी धर्म बदला जा रहा है। अपने काम को अंजाम देने के लिए ये मिशनरियां संगठित होकर कार्य करती है और धन-बल का सहयोग इन्हें पश्चिमी देशों से भरपूर मिलता आया है। मुस्लिम कट्टरपंथी संगठनों को फंडिंग के आरोप कई अरब देश जैसे सऊदी अरब पर भी लगाते आए हैं।  मुद्दे पर वापस लौटते हैं कि हिन्दू आखिर क्यों अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं? इसके पीछे यही कारण है कि ईसाइयत और इस्लाम अपने साथ अन्य लोगों को जोड़ते आए हैं लेकिन हिंदुत्व ऐसा करने में नाकाम रहा है।

हिंदूवादी संगठन किसी का धर्म परिवर्तन नहीं करवाते बल्कि धर्म परिवर्तन करवा चुके लाखों लोगों में से कुछ सौ को वापस हिंदुत्व में जोड़कर ही खुश हो जाते हैं। बाकी धर्म जहां एक मिशन के साथ अपने प्रचार-प्रसार में लगे हैं वहीं हिन्दू इस मुगालते में ही जी रहा है कि वह इन सबसे बहुत ऊपर है और उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। अफगानिस्तान के हिंदुकुश पर्वतों तक हिंदुओं का साम्राज्य था, जो अब सिमटते हुए सिर्फ भारत तक आ चुका है। भारत मे भी केरल, लक्षद्वीप, बंगाल जैसे राज्यों में हिन्दू अल्पसंख्यक होने की कगार तक आ पहुंचे है जबकि मुस्लिम और ईसाइयत का तेज़ी से प्रसार हुआ है। इस विघटन की एक बड़ी वजह हमारी आत्ममुग्धता और दोहरा रवैया है। बड़े हिंदूवादी नेता, जो हिंदुत्व की रक्षा करने का दम भरते हैं खुद उन्हीं के बच्चे आज कान्वेंट में पड़ते है, सांता क्लॉज़ बनते हैं तो फिर बाकी समाज की आखिर क्या गलती है?

हिंदुत्व को यदि आने वाली सदियों तक अपना वजूद बचाकर रखना है तो ये तरीके हमें भी आजमाने ही पड़ेंगे। लोगों को साथ जोड़े बिना कोई छोटा-मोटा आंदोलन भी नहीं खड़ा हो सकता तो ये तो अपने वजूद को बचाने की मुहिम है। हिन्दू अपनी मुगालतों से बाहर निकले और देखें कि क्रिसमस और सांता उनके घर तक आ पहुंचे हैं। अपने धर्म की मार्केटिंग में कोई बुराई नहीं है, लेकिन हिंदुओं को चाहिए कि क्रिसमस का विरोध करने के बजाय इनसे कुछ सीखा जाए। ये कुछ बातें हमें जल्दी ही सीखना होंगी क्योंकि हम यह देख चुके हैं कि सरकारों के भरोसे बैठने से कुछ नहीं होगा। क्रिसमस के आज के त्योहार को हम गौर से देखें और यह जानने की कोशिश करें कि हमसे गलती आखिर कहां हो रही है?

-सचिन पौराणिक

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