Talented View : दुष्कर्म हो रहे और सिस्टम कुम्भकर्णी नींद सो रहा

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कहने को हमारा देश तरक्की की राह पर तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन इस तरक्की के मायने क्या हैं ? यदि हम देश की आने वाली पीढ़ी को ही सुरक्षा नहीं दे पा रहे हैं तो क्या मतलब है ऐसी तरक्की का? “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते” को मानने वाले देश में मासूम बच्चियों के साथ आखिर हो क्या रहा है?

क्या हमारा सिस्टम वाकई इतना लुंजपुंज हो गया है कि हम इन शैतानों को सज़ा तक समय से नहीं दिलवा पा रहे हैं ? क्या हमारी तरक्की गर्व करने के काबिल है ? अलीगढ़ की दरिंदगी पर देश का आक्रोश थमा भी नहीं था कि इसके बाद उज्जैन, भोपाल, मंदसौर से भी ऐसी ही हृदयविदारक घटनाएं सामने आने लगी हैं। कहीं 2 साल, कहीं 5 साल तो कहीं 10 साल की बच्चियों को नोचा जा रहा है।

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आम आदमी इन खबरों को सुनकर समझ नहीं पा रहा है कि वह अपना गुस्सा पुलिस पर निकाले, इस सिस्टम पर निकले, इन भेड़ियों पर निकाले या अपनी किस्मत पर? आखिर क्यों आज़ादी मिलने के दशकों बाद भी हम अपनी बेटियों तक को सुरक्षा नहीं दे पा रहे हैं ? भोपाल में जो हुआ, वह जानकर तो आपका विश्वास पुलिस से उठ ही जाएगा।

अपनी 10 साल छोटी सी बच्ची की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाने पुलिस थाने गए पिता को पुलिस ने यह कहकर लौटा दिया कि वह अपनी मर्ज़ी से कहीं गई होगी, थोड़ी देर में आ जाएगी चिंता मत करो। बेचारा बाप भागता हुआ पार्षद के पास मदद के लिए पहुंचा। पार्षद ने पुलिस को फोन किया तो पुलिस हरकत में आई। बच्ची की तलाश शुरू की गई, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।

बच्ची के साथ हैवानियत की जा चुकी थी और उसकी सांसें भी साथ छोड़ चुकी थीं।  अब पुलिस मामले की जांच की बात कर रही है, आरोपी को सज़ा दिलाने की बात कर रही है, दोषी पुलिस वालों पर भी कार्रवाई की बात कर रही है, लेकिन इन बातों में कोई वज़न है? हमारी पुलिस इतनी भ्रष्ट और संवेदनाशून्य हो चुकी है कि बालिका के परिजन से ऐसे मौके पर भी वे रिश्वत मांगने में पीछे नहीं हटे। देशभर में बच्चियों के साथ दुष्कर्म हो रहे हैं और हमारा सिस्टम कुम्भकर्णी नींद सो रहा है।

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कहने को संविधान में संशोधन कर दिया है, जिससे 12 साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ दरिंदगी पर फांसी का प्रावधान जोड़ दिया गया है, लेकिन फांसी के फंदे तक कोई मुल्ज़िम नहीं पहुंच पा रहा है। इंसाफ करने में हमारी इस देरी की कीमत बेगुनाह बच्चियों को चुकानी पड़ रही है। जनता कानून अपने हाथ में ले नहीं सकती और कानून अपना काम कर नहीं पा रहा है। ऐसी अनिर्णय की स्थिति का भरपूर फायदा ये दरिंदे उठा रहे है।

दुष्कर्म के 24 घंटे के अंदर जब तक इन अपराधियों को फांसी के फंदे पर नहीं लटकाया जाएगा, ये दरिंदगी नहीं रुकने वाली। पुलिस, डॉक्टर, वकील और न्याय-व्यवस्था के फेर में हमारा कानून खुद उलझकर रह गया है। बेटियों के साथ हमारे देश में ऐसा सलूक देखकर आम आदमी खून के आंसू रो रहा है। जिन घरों में बेटियां हैं, वे उनकी सुरक्षा को लेकर अत्यधिक चिंतित हैं, लेकिन इन हालातों को समझने वाला दूर -दूर तक कोई नहीं है। एक आम आदमी ऐसी खबरें सुनकर गुस्से से उबल पड़ता है, लेकिन पता नहीं सत्ताधीशों और प्रशासन में बैठे लोगों को यह गुस्सा दिखाई ही नहीं देता?

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यदि यही हालात जारी रहते हैं तो वह दिन दूर नहीं, जब ऐसे दरिंदों को जनता खुद सज़ा देना शुरू कर देगी। ये अराजकता फैलने से कोई नहीं रोक सकता क्योंकि पानी नाक तक पहुंच चुका है और अब मामला जीवन-मृत्यु का बन चुका है।

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