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“पर उपदेश कुशल बहुतेरे” का उदाहरण हैं राहुल

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पुरानी कहानी है कि संत से एक महिला ने कहा कि मेरा बच्चा गुड़ बहुत खाता है, आप इसे समझाइए। संत एक क्षण को सोच में पड़ गए। फिर उन्होंने कहा, मैं 15 दिन बाद आकर बच्चे को समझा दूंगा। ठीक 15 दिन बाद संत दोबारा आए और उन्होंने बच्चे को प्यार से गुड़ ज्यादा न खाने के लिए समझाया।

बच्चा भी तुरन्त मान गया और उसने गुड़ खाना बिल्कुल बंद कर दिया। बच्चे की मां ने संत से हैरानी से पूछा कि मेरे 2 सवाल हैं। पहला कि आपके कहने से बच्चा मान कैसे गया और दूसरा कि आपने उसी दिन बच्चे को क्यों नहीं समझा दिया?

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संत ने जवाब दिया- मैंने बच्चे को उस दिन इसलिए नहीं समझाया क्योंकि तब मुझे खुद गुड़ खाने की आदत थी। 15 दिन तक मैंने पहले स्वयं की आदत को बदला। यदि उसी दिन मैं बच्चे को समझाता तो उसका कोई असर नहीं होता। असली शिक्षा आचरण द्वारा ही दी जा सकती है इसलिए जब मैंने 15 दिन बाद बच्चे को आकर समझाया तो वह तुरन्त मान गया। ऐसा ही जीवन में अक्सर होता है। कोई खुद सिगरेट के धुएं के छल्ले बनाते हुए यदि किसी को सिगरेट के नुकसान बताएगा तो उसका कोई असर होगा क्या?

यह कहानी बरबस ही याद आ गई, जब यह खबर सुनी कि राहुल गांधी अपनी पार्टी के नेताओं के ‘पुत्रमोह’ से नाराज़ हैं| अशोक गहलोत, कमलनाथ और चिदम्बरम जैसे नेताओं के अपने बेटों को टिकट दिलाने को लेकर राहुल गांधी गुस्सा हैं। उनका सोचना है कि इन नेताओं ने ‘पार्टीहित’ से ऊपर ‘पुत्रहित’ को रखा है।

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इन नेता पुत्रों में चिदंबरम और कमलनाथ के बेटे जीत गए जबकि अशोक गहलोत अपने बेटे वैभव को जीत नहीं दिलवा पाए, लेकिन अपने बेटों को जिताने के चक्कर में इन नेताओं ने पार्टी का बंटाढार कर डाला।

इसकी वजह यह होती है कि बाप का अपने बेटे के साथ भावनात्मक रिश्ता होता है। बेटा चुनाव में खड़ा तो खुद होता है, लेकिन उसके साथ ही बाप की इज़्ज़त भी दांव पर लग जाती है। ऐसे में जितना वक्त उन्हें सभी प्रत्याशियों को देना होता है, उससे ज्यादा वे अपने बेटे को देते हैं और पार्टी को इससे नुकसान उठाना पड़ता है।

राजस्थान और मध्यप्रदेश में यही हुआ भी। अशोक गहलोत और कमलनाथ ने बाकी प्रत्याशियों के लिए ज्यादा प्रचार किया ही नहीं क्योंकि सबसे ज्यादा उन्हें अपने बेटों को जिताने की फिक्र थी।

नतीजा यही निकला कि दोनों राज्यों की 55 सीटों में से कांग्रेस को 54  पर हार का मुंह देखना पड़ा  इसलिए राहुल गांधी का गुस्सा बिल्कुल जायज़ है, लेकिन सवाल ये है कि राहुल गांधी की खुद की काबिलियत क्या है?

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अपने बाप-दादा के कंधों पर चढ़कर खुद राजनीति करने वाले राहुल की बात कांग्रेस के नेता भला क्यों सुनेंगे? नेहरू, इंदिरा, राजीव, सोनिया के बाद जब राहुल कांग्रेस की कमान सम्हाल सकते हैं तो बाकी नेता भी अपने वंश के बारे में सोचेंगे ही। सब जानते हैं कि राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष सिर्फ ‘गांधी’ होने की वजह से बने हुए हैं।

इतनी करारी हार के बाद भी राहुल का इस्तीफा नहीं स्वीकार किया जा रहा है तो इसकी वजह भी उनके नाम मे लगा ‘गांधी’ ही है इसलिए राहुल के गुस्से से किसी नेता को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है क्योंकि खुद के आचरण में कोई चीज़ शामिल किए बिना दूसरों को इसकी सीख नहीं दी जा सकती।

जैसे उस बच्चे को सीख देने के लिये संत ने पहले खुद गुड़ खाना छोड़ा, वैसे ही राहुल गांधी को भी कांग्रेस नेताओं को समझाने से पहले खुद अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ेगा। अपने पुरखों के कंधों पर चढ़कर राजनीति करने वाले राहुल का दूसरे नेताओं को ‘पुत्रमोह’ से बचने का उपदेश देना “पर उपदेश कुशल बहुतेरे” से अधिक कुछ नहीं है।

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