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Talented View : स्मृति से लगी होड़ तो वायनाड लगाई दौड़

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2014 के लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election 2019) में नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने वडोदरा के साथ बनारस (Banaras) से भी चुनाव लड़ा था। तब बनारस से पर्चा भरते वक्त मोदी ने भावुक होते हुए कहा था, “न मैं यहां आया हूं न मुझे किसी ने भेजा है। मुझे मां गंगा ने बुलाया है।” तब कांग्रेस (Congress) सहित विपक्ष के तमाम नेताओं ने एक सुर में कहा था कि मोदी को हार का डर है इसलिए वे दो जगह से चुनाव लड़ रहे हैं। मोदी के खिलाफ बनारस से लड़ रहे केज़रीवाल ने यहां तक कह दिया था कि बनारस में मोदी अपनी हार पक्की समझें और वडोदरा पर ही ध्यान दें।

Talented View : राहुल यह बात समझें तो कांग्रेस का भला होगा

Today Cartoon On Wayanad Lok Sabha Seat :

खैर, 2014 की इस बात को 5 साल बीत गए और गंगा में काफी पानी बह चुका है। अब ताज़ा हालात ये हैं कि बनारस से इस बार फिर मोदी चुनाव लड़ रहे हैं और हार के डर से विपक्ष को उनके खिलाफ़ कोई दमदार प्रत्याशी भी नहीं मिल पा रहा है। इधर, अबकी बार राहुल गांधी अमेठी के अलावा केरल के वायनाड से भी चुनाव लड़ रहे हैं। राहुल के दो जगह चुनाव लड़ने को लेकर कांग्रेस का कहना है कि दक्षिण के नेताओं के भारी दबाव के कारण राहुल गांधी को वायनाड आना पड़ा। साथ ही कांग्रेस इस बात पर भी जोर दे रही है की अमेठी उनकी ‘कर्मभूमि’ बना रहेगा। हालाँकि कांग्रेस वालों की ये दलीलें खोखली है। क्योंकि अगर राहुल दोनों सीटों से चुनाव जीत भी गए तो एक सीट तो उन्हें छोड़नी ही पड़ेगी? तब वो क्या करेंगे?  वे अपनी कर्मभूमि अमेठी की सीट छोड़ेंगे या फिर हिन्दू अल्पसंख्यक वाले वायनाड को ?

Talented View : दूरगामी सोच के साथ मुकाबला करे कांग्रेस

राहुल (Rahul Gandhi) के दो सीटों से चुनाव लड़ने की वजह कहीं स्मृति ईरानी (Smriti Irani) का अमेठी में डर तो नहीं है? सिर्फ एनडीए ही नहीं बल्कि सीपीएम जैसी पार्टियां भी राहुल गांधी पर निशाना साध रही हैं। सीपीएम के मुखपत्र ने राहुल के वायनाड से चुनाव लड़ने को “पप्पू स्ट्राइक” तक कह डाला है। राहुल गांधी आज वायनाड से पर्चा दाखिल कर रहे हैं। वायनाड एक ऐसा क्षेत्र है, जहां हिन्दू आबादी कम है। यहां मुस्लिम और ईसाई बहुसंख्यक है। देखना यह दिलचस्प रहेगा कि उत्तर भारत में खुद को जनेऊधारी हिन्दू बतलाने वाले राहुल गांधी वायनाड में खुद को कैसे प्रोजेक्ट करते हैं ? क्या किसी मंदिर में पूजा करके वे अपने प्रचार की शुरुआत करेंगे या फिर बाकायदा शिवजी का अभिषेक करके माथे पर त्रिपुंड लगाकर अपनी आस्था दिखाएंगे?

सबरीमाला मामले (Sabarimala Temple Dispute) पर भी राहुल गांधी को अपना स्टैंड साफ कर देना चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं करते तो इसका मतलब यही निकलेगा कि वह सिर्फ ‘चुनावी हिन्दू’ है।  कल ही लिखा था कि कांग्रेस इस समय ‘पहचान के संकट’ (आइडेंटिटी क्राइसेस) के दौर से गुज़र रही है। आज एक कदम आगे बढ़कर कहना है कि ये पार्टी ही नहीं बल्कि उसके नेता भी इसी संकट से ग्रस्त हो गए हैं। प्रियंका वाड्रा हिन्दू वोटरों को रिझाने के लिए अयोध्या जा रही है, गंगा आरती कर रही है, लेकिन दूसरी तरफ मुस्लिम वोटर छींटक न जाए, इस डर से रामलला के मामले को विवादित बताकर दर्शन से इनकार भी कर रही है। ऐसे ही ‘जनेऊधारी’ राहुल गांधी समझ नहीं पा रहे हैं कि वायनाड में उनका धर्म क्या रहने वाला है?

Talented View : जिसको सभी ने नकारा, उसने ‘आप’ को नकारा…

यहां मुस्लिम बनने में ज्यादा फायदा है या फिर ईसाई? भाई-बहन के इस असमंजस को समझा जा सकता है। स्मार्ट सिटी के नाम पर प्रधानमंत्री को उलाहना देने वाले राहुल गांधी को बताना चाहिए कि उनके 15 साल सांसद रहने के बाद अमेठी आज भी अति पिछड़ा क्यों है? अमेठी (Amethi) की जनता ने अपनी वफादारी गांधी परिवार के प्रति हमेशा निभाई, लेकिन बदले में उन्हें बदहाली, भुखमरी, पिछड़ापन और बेरोज़गारी के क्या नसीब हुआ?  ये एकतरफा वफादारी बरसों से इसलिए भी चलती आ रही थी क्योंकि सामने कोई मजबूत विकल्प नही था। जैसे ही स्मृति ईरानी के तौर पर जनता को विकल्प दिखाई दिया, वैसे ही राहुल बाबा तुरन्त वायनाड भाग लिए इसलिए अब राहुल गांधी का मज़ाक बनाया जा रहा है। नरेंद्र मोदी की तर्ज़ पर उनके बारे में कहा जा रहा है की- “न मैं यहां आया हूं, न मुझे किसी ने यहां भेजा है। मुझे स्मृति ने यहां भगाया है।”

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