इस सौदे में सबकुछ ठीक नहीं है…

0

2008 की बात है, जब भारतीयों ने बड़े पैमाने पर शेयर बाज़ार में पैसा लगाना शुरू नहीं किया था। उस समय ये बातें सुनने में आती थी कि रिलायंस के शेयरों से लोग बहुत पैसा कमा चुके हैं। उस समय मार्केट में आया अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस पॉवर का आईपीओ। रिलायंस की साख के कारण इस आईपीओ को अभूतपूर्व प्रतिसाद मिला। जिन लोगों ने जिंदगी में कभी शेयर मार्केट में पैसा नहीं लगाया था, उन्होंने भी डीमेट अकाउंट खुलवाकर इस आईपीओ में पैसे लगाए। धूमधाम के साथ यह शेयर मार्केट में लिस्ट हुआ, लेकिन कुछ ही मिनटों में शेयर की जोरदार पिटाई शुरू हो गई।

पहली बार के निवेशक, जो अपना पैसा दोगुना होने की उम्मीद में बैठे थे, वे इतनी तेज़ी से अपना पैसा साफ होते देख समझ ही नहीं पाए कि अब क्या किया जाए? पहले दिन जो शेयर तेज़ गिरावट के साथ बंद हुआ, उसके बाद वह शेयर आज तक भी संभल नहीं पाया है। उसके बाद शेयर को संभालने के लिए उसे स्प्लिट किया गया, बोनस दिया गया लेकिन बिना किसी मजबूत नींव के खड़ा शेयर आखिर कितने दिन मार्केट का दबाव झेल पाता? यह शेयर आज भी कुछ 27 रुपए में मार्केट में उपलब्ध है, लेकिन कोई भी समझदार निवेशक इसमें निवेश नहीं करना चाहता। निवेशकों ने अपनी पूंजी वापस भारी नुकसान के साथ रिलायंस पॉवर, जिस भाव में बिका, बेचकर निकाली और कसम खा ली कि कभी शेयर बाजार या भूले से भी अनिल अंबानी की कंपनी में पैसे नहीं लगाने हैं।

पिछले कुछ दिनों से देश की राजनीति में राफेल विमानों के सौदे में भ्रष्टाचार को लेकर गर्मा-गर्मी मची हुई है। सरकार का कहना है कि सौदा पारदर्शी और साफ-सुथरा है जबकि विपक्ष का कहना है कि इस खरीद में भारी भ्रष्टाचार हुआ है। कांग्रेस इसे सदी का सबसे बड़ा घोटाला सिद्ध करने में लगी हुई है। इस मुद्दे पर कौन सही है, कौन गलत, इस पर काफी चर्चा हो चुकी है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल जो इस ‘राफेल के खेल’ से जुड़ा है वह है भारत में विमान बनाने के सौदे को हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स से छीनकर अनिल अंबानी की कंपनी को देना। राफेल सौदे में सरकार की नीयत चाहे कितनी ही साफ हो, सौदा कितना ही पारदर्शी क्यों न हो, लेकिन यदि अनिल अंबानी और उनकी किसी कंपनी की इसमें कोई भागीदारी है तो आप सवालों से बिल्कुल नहीं बच सकते।

अनिल अंबानी की कंपनियां कैसे निवेशकों को मूर्ख बनाती है, यह इसीलिए पहले ही उदाहरण के साथ स्पष्ट किया जा चुका है। जिस कंपनी ने बिजली बनाने के नाम पर जनता को ठग लिया, वह देश के लिए लड़ाकू विमान बनाकर देगी, यह बात ही हास्यास्पद है। देश जानना चाहता है कि अनिल अंबानी या उनकी किसी कंपनी को लड़ाकू विमान बनाने का आखिर क्या अनुभव है? कभी उन्होंने इससे पहले देश की सुरक्षा के लिए कोई छोटा सा उपकरण कभी बनाकर दिया? अनिल अंबानी को ठेका देने का फैसला किसी का भी रहा हो (जैसा कहा जा रहा है कि फ्रांस की कंपनी डसाल्ट का था), तब भी क्या भारत सरकार को अनिल अंबानी के कारनामे पता नहीं हैं? हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स को हटाकर अनिल अंबानी की कंपनी को ठेका देने का विरोध भारत सरकार कर सकती थी, लेकिन क्यों नहीं किया?  यदि एचएएल की क्षमता कम भी थी तो कम से कम अनुभव तो उनके पास था|

जो कंपनी दशकों से मिराज और सुखोई बना सकती है वह राफेल भी बना ही सकती है, लेकिन अनिल अंबानी की कंपनी को इस पर वरीयता कैसे दी जा सकती है? अनिल अंबानी की मौजूदगी मात्र से यह सौदा सवालों के घेरे में आ जाएगा, क्या सरकार इतनी सी बात नहीं समझती? सरकार की नीयत बेशक सही हो, लेकिन किसी उद्योगपति के इशारों पर सरकार नाचेगी तो सवाल क्यों नहीं उठेंगे? विपक्ष यदि जेपीसी से इस सौदे की जांच की मांग कर रहा है तो जांच करवाकर बेदाग साबित हो जाइए, डर किस बात का है? हर सवाल पर विपक्षी नेताओं (राहुल गांधी) को मसखरा और गैर-जिम्मेदार साबित करने से आप खुद को पाक साफ घोषित नहीं कर सकते। सवालों के जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वाले पर ही सवाल खड़े करना अहंकारी रवैये की निशानी है।

यदि आपको इसमें कोई अंतरराष्ट्रीय साजिश या गठबंधन नज़र आ रहा है तो उसकी भी जांच करवाइए और दोषियों को सख्त सज़ा दिलाइये। आप सत्ता में है और ऐसी साजिशों को बेनकाब करना आपकी जिम्मेदारी है। चुनावी भाषणों में सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप के लिए कुछ भी कह देना सरकार का काम नहीं है। यदि विदेशी ताकतें देश के प्रधानमंत्री को बदलना चाहती है (जैसा प्रधानमंत्री ने कल भोपाल में कहा) तो उन्हें सामने लाइये और ठोस कार्रवाई कीजिए, लेकिन ऐसा लाचारी भरा रवैया जनता के सामने रखकर सिर्फ सहानुभूति बटोरना ही आपका उद्देश्य है तो कुछ नहीं कहा जा सकता। राफेल सौदे में अनिल अंबानी की उपस्थिति इतना बताने के लिए तो काफी है कि इस सौदे में सबकुछ ठीक नहीं है, ‘दाल में कुछ काला’ तो ज़रूर है।

-सचिन पौराणिक

Share.