Talented View: राफेल भुलाकर देश के बारे में सोचें

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तीन राज्यों के चुनाव में हार के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा को राहत देते हुए राफेल सौदे (Rafale Deal)में सरकार को क्लीनचिट दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कर दिया कि इस सौदे में सरकार द्वारा किसी कारोबारी को लाभ पहुंचाने के सबूत नहीं मिले हैं। वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारियों से चर्चा का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि इस सौदे में अपनाई गई प्रक्रिया से हम संतुष्ट हैं।

इसी के साथ कोर्ट ने राफेल विमान सौदे संबंधी सभी याचिकाओं को खारिज़ कर दिया। कोर्ट ने साफ किया कि कुछ लोगों की धारणा और अखबारों में छपी खबर के आधार पर कोर्ट कोई आदेश नहीं दे सकता। भाजपा खेमा इस खबर के बाद से ही कांग्रेस और राहुल गांधी पर हमलावर है तो राहुल गांधी अब भी अपने क़दम पीछे लेने को तैयार नहीं है। कोर्ट के फैसले के बाद भी कांग्रेस का इस मामले की संसद की कमेटी से जांच करवाने की मांग जारी है। राहुल गांधी अब भी यही दोहरा रहे हैं कि चौकीदार चोर है, लेकिन इन सबके बीच असली सवाल पर किसी की नज़र नहीं है।

भारत की कोर्ट में फैसले अमूमन देरी से ही आते हैं इसलिए इनका राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इस पर कुछ भी यकीनी तौर पर कहा नहीं जा सकता है। फ़र्ज़ कीजिए कि राफेल पर कोर्ट का फैसला 3 राज्यों में मतदान से पहले आ जाता तो क्या होता? क्या कांग्रेस को इसका नुकसान नहीं उठाना पड़ता? यह भी संभव था कि इससे कुछ सीटें भाजपा की बढ़ जातीं और शायद मध्यप्रदेश कांग्रेस के हाथ से फिसल जाता? इसी तरह अगर राम मन्दिर मामले में भी मंदिर निर्माण के पक्ष में कोर्ट 2019 के आम चुनाव के बाद कोई फैसला सुना देती है तो इसका भारत की राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा? सभी जानते हैं कि 2019 आम चुनाव से पहले यदि सुप्रीम कोर्ट मंदिर के पक्ष में फैसला दे देती है तो भाजपा की बम्पर जीत पक्की है, लेकिन राफेल की ही तरह भाजपा की हार के बाद कोई फैसला आया तो इसका राजनीतिक फायदा उठाना कांग्रेस के लिए आसान होगा।

खैर, कोर्ट अपने तरीके से ही चलता आया है और चलेगा, लेकिन राफेल सौदे पर आया फैसला पक्ष-विपक्ष दोनों के लिए सबक है। सरकार के लिए खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है क्योंकि राफेल की कीमत को लेकर कोर्ट गहराई में नहीं गई है। कोर्ट ने प्रक्रियागत निर्णय और राफेल की ज़रूरत को न्यायोचित ठहराया है, लेकिन इसकी कीमत के सवाल पर कोई टिप्पणी नहीं की है। सरकार की सफाई को मानते हुए कोर्ट ने इतना भर कहा कि राफेल की क्षमता पर कोई सवाल नहीं है, लेकिन कीमतों के फेर में हम नहीं पड़ना चाहते।

अब राहुल गांधी को भी जीत के जोश में अदालत के खिलाफ जाने की जिद छोड़ देना चाहिए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट से बढ़कर संसद की जेपीसी (जॉइंट पार्लियामेंट्री कमेटी) नहीं है। सरकार को भी राफेल पर फैसले को अपनी जीत मानने से बचना चाहिए क्योंकि फैसले को चुनौती भी दी जा सकती है। सत्तापक्ष को समझना होगा कि राफेल में यदि वे इतने ही विश्वास में होते तो क्रिश्चियन मिशेल को भारत लाकर अगस्ता वेस्टलैंड की फ़ाइल खोलने की ज़रूरत ही क्या पड़ती? इसलिए दोनो पक्षों को अब राफेल भुलाकर देश के बारे में सोचना शुरू कर देना चाहिए।

-सचिन पौराणिक

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