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Talented View : सेना और कलाकार करें मोदी पर प्रहार

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हमारे देश में कलाकारों और सेना को सबसे ज्यादा इज्ज़त दी जाती है। क्योंकि ये लोग देश को ध्यान में रखकर काम करतें है।कलाकारों के बारे में कहा जाता है की उनका राजनीति से कोई मतलब नही होता। उनका जीवन सिर्फ कला को समर्पित रहता है। बाकी देश की राजनीतिक उठापठक से वो अमूमन अनजान ही बने रहते है। ऐसा ही सेना के साथ भी है। हमारे जवान अपना घर-परिवार सब छोड़कर विकट हालातों में देश की सीमाओं की सुरक्षा में तैनात होतें है। इस समय देश मे किसकी सरकार है जैसी बातें उनके लिए कोई मायने नही रखती। उनके लिये देश ही सबकुछ है। कला और सेना से जुड़े व्यक्तियों में वैसे कोई ज्यादा समानताएं नही है सिवाय इस बात के की ये लोग अपने काम को समर्पण के साथ करतें है। इन लोगों के लिए राजनीतिक हालात, कोई विशेष मायने नही रखते। ये लोग राजनीति से दूर रहकर चुपचाप अपने काम मे लगे रहतें है।

लेकिन बीते कुछ समय मे सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के चलते सेना और कला से जुड़े लोग भी राजनीतिक विषयो पर खुलकर बोलने लगे है। सेना के जवान हालांकि तब भी एक अनुशासन से बंधे होतें है लेकिन कला के क्षेत्र से राजनीतिक आवाज़े गाहे-बगाहे सुनाई दे ही जाने लगी है। अभी एक चिट्ठी की चर्चा हो रही है जिसमें कला और सिनेमा से जुड़े सैंकड़ो लोगों ने एक पत्र पर दस्तखत किए है। उस पत्र में जनता से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वोट न देने की अपील की गयी है। ऐसा ही एक पत्र सेना के पूर्व अधिकारियों द्वारा भी लिखा गया है। जिसमे कहा गया है की सेना का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए नही किया जाना चाहिए। हालांकि दोनों ही चिट्ठियों के सार्वजनिक होने के बाद कुछ कलाकारों और सेन्य अधिकारियों ने स्पष्टीकरण दिया है की उन्होंने न ऐसी किसी चिट्टी पर हस्ताक्षर किए है और न ही वो चिट्ठी के मजमून से इत्तेफाक रखते है। इसके अलावा राष्ट्रपति भवन ने भी ऐसी किसी चिट्टी के मिलने की बात से इनकार कर दिया है। ऐसे में सवाल है की ये चिट्ठियां आखिर लिख कौन रहा है? किसके इशारे पर कलाकार और सैन्य अधिकारी खुलकर राजनीतिक नाकाबंदी करने में लगे है? ऐसी चिट्ठियों से किसको फायदा मिल रहा है?हालात इतने विकट तो नही दिखाई दे रहे है जो कलाकारों और सैन्य अधिकारियों को राजनीतिक मामलों में कूदना पड़ रहा है? और मीडिया भी क्यों बिना तफ्तीश किये इन चिट्ठियों को उछाल रही है? बड़े-बड़े न्यूज़ नेटवर्क क्या एक मामूली सी चिट्ठी की सत्यता का पता नही लगा सकते? दफ्तर में बैठे-बैठे ही कुछ लोग जिनके चिट्ठी में हस्ताक्षर है, क्या उनसे इस बारे में पूछ नही सकते? क्यों बिना सच जाने ऐसी खबरें दर्शको को परोस दी जाती है? देश को राजनीतिक रूप से अस्थिर करने की ये कोई नई साजिश तो नही है? चुनावी मौसम में सत्ता का विरोध करती रोज़ एक नयी चिट्ठी का सामने आना क्या दर्शाता है? अगर कलाकार या फिर सैन्य अधिकारी राजनीति करना चाहतें है तो उन्हें खुलकर सामने आना चाहिए। पूर्व सेनाध्यक्ष वीके सिंग, राज्यवर्धन राठौर, कैप्टेन अमरिंदर जैसे सेना से जुड़े लोग आज सक्रिय राजनीति में है। फ़िल्म और कला से जुड़े राज़ बब्बर, हेमा मालिनी, नगमा, उर्मिला मातोंडकर जैसी शख्सियतें भी खुलकर राजनीति कर रही है।

कलाकारों और सैन्य अधिकारियों को राजनीति करने में कोई पाबंदी नही है। ये अधिकार उन्हें भारत के संविधान ने दिया है। लेकिन छुप-छुपकर अपना एजेंडा चलना और उसके बाद खुद को तटस्थ दिखलाना खतरनाक है। कलाकारों और सैना की इज्जत हर देशवासी इसीलिए करता है क्योंकि ये राजनीति से ऊपर उठकर देश की बात करतें है। लेकिन ये लोग भी इसी कीचड़ में सने नज़र आएंगे तो निसंदेह इनकी इज़्ज़त में भी कमी आएगी। कलाकारों और पूर्व सेना अधिकारियों को देश के बारे में सोचकर राजनीति से दूर हो जाना चाहिए। एक बार मतलब निकल जाने पर इन्हें ऐसा करने के लिए उकसाने वाले रहबर भी इनकी तरफ पलटकर नही देखेंगे। ये बात इन्हें समझ आ जाना चाहिए। ऐसा नही होता है तो एक सम्मानित बिरादरी अपना सम्मान अपनी आंखों के सामने धूल में मिलता देखेगी।

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