Talented View : राहुल प्रधानमंत्री मोदी से सीख सकते हैं

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2014 के पूर्व तक भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति के मुख्य चेहरों पर नज़र डालिए। अटलजी, आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, जसवंत सिंह जैसे लोग ही भाजपा का चेहरा थे, लेकिन 2014 में जैसे ही नरेंद्र मोदी को तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथसिंह ने चुनाव प्रचार प्रमुख बनाया, तब से ये बड़े नेता नेपथ्य में कहीं गुम हो गए। नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने पार्टी को अपने हिसाब से चलाया और जबरदस्त सफलता प्राप्त की। अगर भाजपा उन्हीं पुराने चेहरों को सामने करके 2014 का चुनाव लड़ती तो इसमें कोई शक नहीं कि भाजपा आज भी विपक्ष में ही होती।

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Today Cartoon On Rahul Gandhi Resignation, Priyanka Gandhi, Sonia Gandhi

बहरहाल, 2019 का आम चुनाव हारने के बाद से कांग्रेस में सर-फुटव्वल मचा हुआ है। राहुल गांधी हार की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देने पर अड़े हुए हैं तो सोनिया और प्रियंका उन्हें मनाने में लगे हुए हैं, लेकिन राहुल गांधी चाहते हैं कि कांग्रेस का अध्यक्ष पद किसी गैर-गांधी को दिया जाए और वे अपना पूरा ध्यान पार्टी को मजबूत करने पर लगाना चाहते हैं, लेकिन कांग्रेस की अपनी मज़बूरी है। किसी गैर-गांधी के अध्यक्ष बनने की सूरत में पार्टी में फूट की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। इसके अलावा गैर-गांधी अध्यक्ष की स्वीकार्यता पर भी प्रश्नचिन्ह लगे हुए हैं, लेकिन राहुल के नज़रिये से देखा जाए तो उनकी सोच गलत नहीं है।

मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की जीत के साथ ही राहुल सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे, लेकिन ऐसा हो नहीं सका। पुराने नेताओं की हठ के चलते राहुल गांधी को झुकना पड़ा। अशोक गहलोत और कमलनाथ का मुख्यमंत्री बनना न राहुल को पसंद आया और न ही जनता को। लोकसभा चुनाव में जनता ने अपनी नाराज़गी जता दी और कांग्रेस का सूपड़ा ही साफ कर दिया। अपनी अनदेखी से नाराज़ इन दोनों नेताओं ने भी चुनाव प्रचार में ज्यादा रुचि नहीं ली। सिंधिया तो बीच चुनाव में ही अमेरिका चले गए थे।

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असल में कांग्रेस के पास पुराने बुजुर्ग नेताओं की बड़ी लंबी फेहरिस्त है, जिनके पास अब पार्टी को देने के लिए कुछ नहीं है, लेकिन तब भी पार्टी के निर्णय को वे प्रभावित करते रहते हैं। भाजपा की समस्या भी यही थी, लेकिन मोदी-शाह ने अपने अंदाज में सभी बुज़ुर्गों को ठिकाने लगा दिया। राहुल गांधी ये काम नहीं कर पा रहे हैं। राहुल को भी बिना हिचके अपनी युवा टीम बनानी चाहिए और 2024 के लिए अभी से तैयारियों में लग जाना चाहिए।

राहुल के पास हिंदुस्तान की सबसे पुरानी पार्टी है, गांव-गांव तक फैला जनाधार है और सबसे बड़ी बात उनके पास समय है। वे चाहें तो पार्टी का कायाकल्प कर सकते हैं,  लेकिन कहते हैं कि लंबे सफर में राह के कंकड़ बड़ी बाधा नहीं है बल्कि जूते के अंदर के कंकड़ ज्यादा बड़ी बाधा है इसलिए राहुल को बिना झिझक के तुरन्त बुज़ुर्ग नेताओं से छुटकारा पा लेना चाहिए और युवा टीम के साथ अभी से काम पर लग जाना चाहिए। कांग्रेस के पास अब खोने को कुछ नहीं है। आज कांग्रेस जहां है, वहां से सिर्फ आगे ही बढ़ा जा सकता है| पीछे जाने का कोई विकल्प अब बचा नहीं है।

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राहुल एक बार आक्रामक होकर काम करना शुरू करेंगे तो ज़मीनी कार्यकर्ता में भी जोश जगेगा। राहुल को मोदी-शाह से भी सीखना चाहिए कि यदि भाजपा अपने बुज़ुर्गों को पीछे करके आगे बढ़ सकती है तो कांग्रेस भी यह कर ही सकती है। राहुल को जनता से सीधा संवाद कायम करना चाहिए और अपने साथियों को भी ऐसा ही करने के लिए कहना चाहिए। 5 साल का कार्यकाल बहुत लंबा होता है और इसमें जनता कई बार नाराज़ होती है। राहुल यदि जनता के बीच उपलब्ध रहेंगे तो जनता भी उन्हें विकल्प के तौर पर देखने लगेगी। इसके अलावा अपने गुप्त विदेश दौरों, अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण और मोदी पर निजी हमलों से भी राहुल को बचना होगा। हंसी-ठिठौली से इतर एक गंभीर नेता के तौर पर अपनी छवि राहुल गांधी बना पाएंगे तो जनता भी उन्हें एक मौका ज़रूर देगी।

एक बात और जो सबसे महत्वपूर्ण है वह यह कि राजनीतिक परिवारवाद से जनता अब ऊब चुकी है। मोदी अपनी मां के साथ देखे जाएंगे तो जनता उन्हें प्यार करेगी, लेकिन राहुल को अपनीं मां-बहन और जीजाजी के साथ बार-बार देखकर जनता का गुस्सा ही भड़केगा क्योंकि राहुल के परिवार का राजनीतिक इतिहास रहा है और सभी सक्रिय राजनीति में शामिल भी हैं। रॉबर्ट वाड्रा की छवि पहले ही झांसेबाज़ की बन चुकी है इसलिए राहुल का परिवार आज उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गया है। अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत बनाने की जो कला है, वह राहुल प्रधानमंत्री मोदी से सीख सकते हैं। इन सब बातों पर राहुल अमल करते हैं तो ऐसा कोई कारण नहीं है कि कांग्रेस दोबारा वापसी न कर पाए।

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