…फिर विपक्ष में बैठा देंगे

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नितिन गडकरी ने एक साक्षात्कार के दौरान यह बात कबूल की थी कि उनकी पार्टी इतने लंबे समय तक विपक्ष में रही कि सत्ता प्राप्त करने के बाद भी उनकी मानसिकता को बदलना आसान नहीं था। बात सही भी है कि जिस पार्टी को सड़कों पर संघर्ष का ही ज्यादा अनुभव रहा हो, उन्हें यकायक सत्ता के सिंहासन पर बैठा दिया जाए तो प्रारम्भ में उनके लिए इस पर भरोसा करना भी मुश्किल हो जाता है, लेकिन वर्तमान समय में देश की सच्चाई यही है कि भाजपानीत एनडीए सरकार केंद्र में पूर्ण बहुमत के साथ मौजूद है और कांग्रेस सहित बाकी बचे दल विपक्ष में हैं। देश में इस समय पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों में आग लगी हुई है| पेट्रोलियम पदार्थों के दाम ने महंगाई के सारे रिकॉर्ड दिए है, लेकिन सत्तारूढ़ दल का कहना है कि इनकी कीमतों को कम करना हमारे बस में नहीं है।

यह सच्चाई है कि 2014 में जब भाजपा सरकार बनी, तब उन्हें विरासत में तेल कंपनियों पर हज़ारों करोड़ का कर्ज मिला था, लेकिन यह भी सच्चाई है कि तब तक अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में क्रूड के भाव लगभग एक तिहाई कम हो गए थे। उस समय कहा गया कि तेल कंपनियों को महंगे कर्ज़ से बचाने और देश की तिजोरी भरने के लिए सस्ते क्रूड का लाभ जनता तक नहीं पहुंचाया जा सकता है। जनता ने भी बड़ा दिल रखते हुए इस तथ्य को स्वीकार किया और खामोशी से महंगा पेट्रोल अपनी गाड़ियों में भरवाया, यह सोचकर कि यह कदम देशहित में है। इस बीच सरकार ने पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें बाज़ार के हवाले कर दी, जिससे जनता को रोज़ ही नए दाम में पेट्रोल भरवाना पड़ा।

सरकार का कहना था कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में रोज़ बढ़ती-घटती कीमतों की वजह से ऐसा करना व्यावहारिक भी है और तर्कसंगत भी। जनता ने यह कदम भी बिना किसी विरोध के स्वीकार किया। सरकार के अनुसार इस कदम के बाद अब पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों पर उनका कोई कंट्रोल नहीं रहा। उसके बाद कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने लगी, लेकिन जनता को यकीन था कि पहले जो महंगा पेट्रोल भरवाकर सरकार की तिजोरी भरी थी, उसका फायदा अब जनता को लौटा दिया जाएगा, लेकिन सरकार ने उम्मीदों के विपरीत ऐसा कुछ नहीं किया। क्रूड की कीमतें वर्तमान में 77$ के करीब है और पेट्रोल 88 रुपए तक पहुंच गया है जबकि इससे पहले 2013 में क्रूड के भाव 115$ तक पहुंच गए थे| तब भी भारत में पेट्रोल इतना महंगा कभी नहीं बिका था।

ऐसे में सरकार से सवाल है कि यदि पुराना घाटा सब बराबर हो चुका है तो तेल की कीमतें बढ़ाकर जनता को क्यों इसमे झोंका जा रहा है? सरकार का यदि पेट्रोलियम पदार्थों के भाव पर कोई नियंत्रण ही नहीं है तो पहले जनता को सब्जबाग क्यों दिखाए?  यदि सरकार का बढ़ते पेट्रोल-डीजल पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया तो आखिर क्यों कर्नाटक चुनाव के दौरान पेट्रोल-डीज़ल के भाव नहीं बढ़ाए गए? क्यों यह नारा दिया गया था कि “बहुत हुई पेट्रोल-डीज़ल की मार, अबकी बार मोदी सरकार”? सरकार से न पेट्रोल संभल रहा है न डॉलर और न ही रसोई गैस| ऐसे में जनता आखिर क्या करे? क्यों नहीं सरकार पेट्रोल-डीज़ल को जीएसटी के दायरे में ले आती है? महंगे पेट्रोल पर केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद के ऐसे बेबसी भरे वक्तव्य से जनता को क्या संदेश जाएगा?

भाजपा जब विपक्ष में रहती है तो उसके पास पेट्रोल-डीजल के भाव कम करने का तरीका भी होता है, पाकिस्तान और कश्मीर का स्थायी इलाज भी होता है और राम मंदिर निर्माण और धारा 370 हटाने का फार्मूला भी होता है, देश को महंगाई से बचाने और महिलाओं की सुरक्षा की योजना भी होती है और जनसंख्या नियंत्रण कानून भी होता है, लेकिन जैसे ही ये लोग सत्ता में आते हैं, इनके सुर बदल जाते हैं। सत्ता में बैठकर ऐसे लाचारी वाले वक्तव्य क्या देश के केंद्रीय मंत्री को शोभा देते हैं? सत्ता संभाले भाजपा को 4 साल से अधिक समय बीत चुका है और अब उन्हें समझना चाहिए कि अपनी हर नाकामी का ठीकरा पुरानी सरकारों पर फोड़ने से कोई समस्या हल नहीं होने वाली है बल्कि इससे जनता में गुस्सा और ज्यादा भड़कता है कि पुरानी सरकारें निकम्मी थी, तभी तो चुना है।

हर दिन यह बात उसी जनता को समझाने का क्या तुक बनता है? सत्ता में रहते हुए भी विपक्षी दल वाला बर्ताव जनता को बिल्कुल रास नहीं आ रहा है। भाजपा यही बर्ताव जारी रखती है तो जनता फिर से इन्हें विपक्ष में ही बैठा देगी, जिससे ये विपक्ष में बैठकर देश की सारी समस्याओं का समाधान पुनः खोज सकें।

-सचिन पौराणिक

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