Talented View : वक्त, वक्त की बात है

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“बख्शे हम भी न गए बख्शे तुम भी न जाओगे

वक्त जानता है हर चेहरे को बेनकाब करना..”

बीते दिनों की घटनाओं को देखते हुए ये शेर अचानक ही याद आ गया। देश-विदेश में चारो तरफ घट रही घटनाओं से एक अलग ही नज़ारा देखने को मिल रहा है। रोज़ ये यकीन पुख्ता होता जा रहा है कि वक्त की लहरों पर सवार चेहरे जिन्हें हम पूजने लगतें है, वो चेहरे असल मे कुछ नही है। उन चेहरों के पास अपनी कोई शक्ति नही है, असली ताकत सिर्फ वक्त के पास है। जिसका वक्त सही है वो शहंशाह है। आज कोई चेहरा ताकतवर है तो कल कोई और होगा।

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति और सेनाध्यक्ष परवेज़ मुशर्रफ को पाकिस्तानी कोर्ट ने मौत की सज़ा सुनाई है, जीतू सोनी के इंदौर में सभी मकान, दुकान, ऑफिस ध्वस्त किये जा रहे है, कल के नामी गुंडे आज पुलिस से भागते फिर रहे है और राजनीति में जिन चेहरों को ‘अछूत’ माना जाता था वो आज सबसे कद्दावर नेता बन चुकें है। वक्त का ये निराला खेल एक बहुत बड़ा संदेश दे रहा है। एक शेर है-

“तुझसे पहले जो शख्स तख्तनशीं था..

उसे भी अपने खुदा होने का इतना ही यकीन था..”

कोई सोच सकता था भारत को कारगिल युद्ध मे झोंकने वाले तत्कालीन पाक प्रधानमंत्री को मौत की सज़ा पाकिस्तान की ही कोर्ट सुना देगी? किसने सोचा था कि कुछ साल पहले तक जिसे कांग्रेस सरकार ने तड़ीपार किया था वो शख्स देश का गृहमंत्री बन जायेगा? किसने उम्मीद की थी देश की सुप्रीम कोर्ट राममंदिर पर निर्णय सर्वसम्मति से सुना देगी? किसने कल्पना की थी कि पी चिदम्बरम जैसा नेता जैल जाएगा और जमानत को तरस जायेगा? इंदौर की ही बात करें तो जीतू सोनी जैसे ताकतवर शख्स का प्रशासन ऐसा हाल कर देगा ये किसने सोचा था?

देश की बात करें तो धारा 370 हटना, तीन तलाक पर कानून बनना, पाकिस्तान को घर मे घुसकर मारना, नागरिकता संसोधन बिल पारित होना और नरेंद्र मोदी का दुबारा 303 सीट के साथ प्रधानमंत्री बनना अकल्पनीय बातें ही थी। लेकिन ये हुआ है। और आगे जो होना है उसे भी एक वर्ग ने पहचान लिया है, सारा हंगामा इसलिए मचा हुआ है। आगे समान नागरिक संहिता कानून भी आयेगा और जनसँख्या नियंत्रण कानून भी बनेगा ये बात सरकार के पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए साफ नज़र आ रही है। देशहित के इन फैसलों पर तुष्टिकरण की राजनीति करने वालो को धार्मिक भेदभाव दिखाई दे रहा है।

बौद्ध, सिख, जैन, हिन्दू, पारसी और ईसाई जैसे 6 धर्म के लोगों की हक की बात करने पर सत्ता पक्ष को सांप्रदायिक करार दिया जा रहा है। लेकिन सिर्फ मुसलमानों की बात करने वाले, सिर्फ उनका भला सोचने वालों को धर्म निरपेक्ष का दर्जा दिया हुआ है। ये भी भारत के लोकतंत्र की एक अनसुनी कहानी है। जनता ये भी देख रही है और इसके मायने भी अच्छे से समझ रही है।

कहने का तारतम्य इतना ही है कि विपक्ष जिसे बुरे दिन समझ रहा है असल में वो अच्छे दिन कहला सकतें है। अगर अगले चुनावों में विपक्ष की इस ओछी राजनीति के चलते जनता उन्हें पूरी तरह नकार दे तो ये हालात उन्हें अच्छे दिनों की तरह ही लगेंगे। अच्छे दिन न इतने अच्छे है और न बुरे दिन इतने बुरे। इससे भी बुरे दिन आ सकतें है। और ऐसा लगता है कि वो आएंगे ही। लेकिन विपक्ष के बुरे दिन सत्ता पक्ष के अच्छे दिनो की ग्यारंटी नही है। वक्त किसी का सगा नही होता।

आज आप मुशर्रफ की तरह शक्तिशाली है तो कल को आपको मौत की सज़ा भी सुनाई जा सकती है। और अगर आज आप तड़ीपार है तो कल वक्त आपको गृहमंत्री के पद तक भी पहुंचा सकता है। अच्छे वक्त में अर्जित की गई सद्भावना ही बुरे दौर से निपटने का एक रास्ता है। नही तो सेवानिवृत्त के बाद बड़े से बड़े अधिकारी को दिन-रात अभिवादन करने वाला मामूली बाबू भी उन्हें देखकर नज़रे फेर लेता है। वक्त की अदालत में सबकी पेशी होती है, सभी का मुकदमा सुना जाता है और सभी को न्याय मिलकर ही रहता है। आखिर में बस यही की-

“वक्त रहता नही कहीं टिककर

आदत इसकी भी आदमी सी है”

        – सचिन पौराणिक

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