ओवैसी अपनी राजनीति चमकाने के लिए भय का माहौल बना रहे

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अटलजी जब प्रधानमंत्री थे तो वे आतंकवाद से लड़ने के लिए एक बेहद मजबूत कानून लेकर आए थे “पोटा” अर्थात प्रिवेंशन ऑफ टेररिज्म एक्ट। इस कानून का तत्कालीन विपक्ष ने पुरजोर विरोध किया था। इस कानून में ऐसे प्रावधान थे, जिसमें किसी व्यक्ति को अपराध के पूर्व भी गिरफ्तार किया जा सकता था। इस कानून का उद्देश्य आतंकवाद पर लगाम लगाना और राष्ट्र विरोधी तत्वों पर लगाम कसना था। अभी तक के आतंकवाद विरोधी कानून में ‘पोटा’ सबसे ज्यादा प्रभावी और कठोर था।

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Today Cartoon On NIA Amendment Bil 2019 In Lok Sabha, Amit Shah

अटलजी की सरकार आतंक पर सख्त प्रहार करने की मंशा से इस कानून को लेकर आई थी, लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। 2002 में यह कानून बन ज़रूर गया, लेकिन 2004 का चुनाव हारने के बाद अगली सरकार ने इस कानून को एक अध्यादेश लाकर तुरन्त निरस्त कर दिया। तर्क दिया गया कि आतंकवाद पर कार्रवाई के लिए पहले ही बहुत से कानून देश में हैं।

यह कदम एक तरह से देश विरोधी था, लेकिन लोकतंत्र में सरकारें अपने “वोटबैंक” को खुश करने के लिए इस तरह की हरकतें करती है। पहले से कानून होने का तर्क बिल्कुल खोखला था क्योंकि यदि पहले से कई कानून है तो एक कानून और होने से क्या फर्क पड़ रहा था?

खैर, ये ‘पोटा पुराण’ आज इसलिए याद आ गया क्योंकि कल संसद में एनआईए को और अधिक शक्तिशाली बनाने का संशोधन विधेयक पास हो गया है। नए प्रावधानों के मुताबिक आतंकवाद के मामलों की जांच करने वाली ‘नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी’ अब देश के बाहर भी किसी अपराधी पर केस रजिस्टर और जांच कर सकती है, लेकिन जैसी कि उम्मीद थी कि असद्दुदीन ओवैसी जैसे नेताओं को इस कानून से अभी से तकलीफ शुरू हो गई।

गृहमंत्री अमित शाह ने भी ओवैसी को उन्हीं की भाषा मे समझाने की कोशिश की और लोकसभा में दोनों नेताओं के बीच की यह चर्चा देश में सुर्खियां भी बनी हुई है। असली प्रश्न यह है कि यदि एनआईए को मजबूत किया जा रहा है तो इसमें किसी को क्या दिक्कत है ? आतंकवाद के खात्मे के लिए सभी दलों को सरकार के साथ कंधा मिलाकर नहीं खड़ा रहना चाहिए ?

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क्या आतंकवादियों पर सख्त कार्रवाई हो, इस पर राजनीतिक दलों में आम सहमति नहीं होना चाहिए?  आखिर क्यों आतंकवाद पर सख्त कार्रवाई के नाम से एक ‘वर्ग विशेष’ को गुमराह किया जाता है ? आतंकवाद पर हमला क्यों कुछ साम्प्रदायिक नेताओं द्वारा मुसलमानों पर हमला बना लिया जाता है ? ऐसा माहौल क्यों बना दिया जाता है मानो आतंकवाद पर नरमी दिखाने से यह वर्ग खुश होगा ? ओवैसी जैसे नेता अपनी राजनीति चमकाने के लिए ऐसा माहौल बना रहे हैं कि देश का मुसलमान डरा हुआ है।

एनआईए को मजबूत किए जाने को लेकर भी ऐसी ही अफवाहें फैलाई जा रही है कि इससे बेकसूरों को परेशान किया जाएगा जबकि हकीकत इस काल्पनिक थ्योरी से कोसों दूर है।

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एनआईए की कार्रवाई के पीछे खुफिया इनपुट्स होते हैं। इसके बाद भी एनआईए तब तक किसी को गिरफ्तार नहीं करती, जब तक उसके किसी संदिग्ध गतिविधि में लिप्त होने की पुख्ता जानकारी न हो। सबसे बड़ी बात यह है कि एनआईए वाले किसी को गिरफ्तार करने से पहले उसका धर्म-मजहब नही खंगालते। अटलजी की सरकार के 17 बरसों बाद मोदी 2.0  के राज में आतंक पर प्रहार की इच्छाशक्ति पुनः देखने को मिली है। इस कानून के विरोध करने का कोई आधार नहीं है।

आतंक को नेस्तनाबूद करने के लिए सुरक्षा एजेंसियों को अधिकार देने ही पड़ते हैं। इस नए कानून से उम्मीद करते हैं कि आतंक पर लगाम लगेगी और देश सुरक्षित होगा। ओवेसी जैसे नेता, जो किसी भी बहाने से ऐसे कानून का विरोध कर रहे हैं उनकी सच्चाई जनता तक पहुंचनी चाहिए। सरकार की आलोचना होना चाहिए, लेकिन नेक मंशा से किए गए कामों की तारीफ करने में भी पीछे नहीं हटना चाहिए। सरकार का यह कदम यकीनन काबिलेतारीफ है।

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