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Talented View : मंदी vs सरकार

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शेयर बाज़ार के उछाल और गिरावट से प्रत्यक्ष प्रभावित होने वालों की तादाद जनसंख्या का बमुश्किल 1% है। इस उतार-चढ़ाव से परोक्ष तौर पर प्रभावित होने वालों में आम निवेशक भी आ जाता है जो म्युच्युअल फंड द्वारा बाजार में निवेश करता हैं। चूंकि म्युच्युअल फंड में बाज़ार के उतार-चढ़ाव से ही पैसा बनता है इसलिए वो भी इसकी ज्यादा फिक्र नही करते। आजकल निवेषक भी इतने बुद्धिशाली हो चुके है कि वो उतना ही पैसा बाजार में लगातें है जिसके कम-ज्यादा होने से उनकी सेहत पर कोई असर नही आये।

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अभी मंदी की आहट का दौर चल रहा है। शेयर मार्केट भी नीचे आ रहा था। विपक्ष भी मार्केट में निवेशकों के पैसे डूबने को बड़ा मुद्दा बना रहा था। ऐसे में एक तरफ ‘नागनाथ’ तो दूसरी तरफ ‘सांपनाथ’ जैसे हालात जनता के लिए पैदा हो चुके है। पक्ष-विपक्ष दोनो ही नही समझ पा रहे है कि शेयर बाजार में बढत या गिरावट आने से धरातल के हालातों में रत्तीभर भी अंतर नही पड़ता है। जिसके पास नौकरी नही है, पैसा नही है उसे क्या फर्क पड़ता है या बात से ही सेंसेक्स 40 हजार पर है या 4 हजार पर?

लेकिन विपक्ष शेयर बाजार की कमज़ोरी को मुद्दा बना रहा था तो सरकार ने भी कुछ घोषणाएं करके बज़ार को खुश कर दिया और बाजार गुलज़ार हो गए। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कॉरपोरेट टेक्स को कम करके कॉरपोरेट सेक्टर को खुश कर दिया और बाजार ने भी इस फैसले को सलामी देते हुए 2000 से ज्यादा अंको को तेज़ी दिखा दी। लेकिन समझने वाली बात यहां ये है कि ये टेक्स कंपनियों की ‘कमाई’ लगता है। और आज के हालात ये है कि कोई कंपनी कमाने लायक बची ही कहाँ है?

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कमाई के बिना टेक्स वैसे ही किसी काम का नही था। लेकिन शेयर बाज़ार “सेंटीमेंट्स” पर चलता है और इस फैसले से ऐतिहासिक तेज़ी बाज़ार में दर्ज हो गयी। लेकिन इस तेज़ी से बेरोज़गारी, महंगाई पर कुछ फर्क पड़ा क्या? अर्थव्यवस्था की हालत में कोई फर्क पड़ा क्या? नौकरियों पर लहराते संकट के हालात में कोई परिवर्तन आया क्या? सब कुछ जब पहले जैसा ही है तो ये 2000 अंको की तेज़ी जनता के किस काम की?

मोदीजी “हाऊडी मोदी” की तैयारी में लगे है, जिस पर तंज कसते हुए राहुल गांधी ने पूछा था “हाउडी इकोनॉमी” तिस पर अब वित्तमंत्री खुशी से बता रही है ये देखिये “हाउडी स्टॉक मार्केट”। लेकिन कोई ये नही पुछ रहा “हाउडी बेरोज़गारी”, “हाउडी महंगाई” और “हाउडी नौकरियों पर संकट”। खेर, बाज़ार की ये तेज़ी पानी के बुलबुले से ज्यादा कुछ नही है। ये बुलबुला जल्दी फूटेगा और असल तस्वीर बाहर आ जाएगी। लेकिन दुख इस बात का है कि पक्ष-विपक्ष दोनो ही हवाई तस्वीरों और वादों से इतर जनता के असली हालात समझने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे है।

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     – सचिन पौराणिक

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