Talented View : मौज में दुष्कर्मी की सजा न्यायव्यवस्था, नहीं निर्भया की माँ भुगत रही

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(Cartoon On Nirbhaya Case) पुरानी फिल्मों में अक्सर आपने देखा होगा कि जब विलेन हीरो से नही निपट पाता तब वो उसकी माँ, बहन या प्रेमिका का अपहरण कर लेता है। ऐसी स्थिति में हीरो को मजबूर होना पड़ जाता है विलेन की बात मानने के लिए। हालांकि कई बार इसका उल्टा भी होता है। जैसे फ़िल्म ‘शोले’ में वीरू को बांध दिया जाता है तो बसंती को जबरन गब्बर सिंग के सामने नाचना पड़ता है। ऐसे दृश्य भावनात्मक रूप से दर्शकों को झकझोर देतें है। लेकिन फिल्में भी असल जिंदगी से ही निकलती है।निजी जीवन में भी किसी ‘अपने’ के साथ कोई दुर्घटना (Cartoon On Nirbhaya Case) हो जाती है तो उसके करीबियों को ही इसकी सबसे ज्यादा सज़ा भुगतना पड़ती है। भावनात्मक लगाव के कारण कुछ दर्द कभी नही भुलाए जा सकते। और जरुरी नही की अपने दर्द से ही दुख हो, कई बार दूसरों का दर्द देखकर भी आंखे भीग जाती है। ऐसी ही आंख भीगने की घटना का देश कल एक बार फिर गवाह बना। बहुचर्चित ‘निर्भया’ मामले में दोषियो की सज़ा एक बार पुनः टाल दी गई और निर्भया की मां (Nirbhaya Mother Aasha Devi)  के आंसू फिर आंखों से बहना शुरू हो गए।

मौज में दुष्कर्मी की सजा न्यायव्यवस्था नहीं, निर्भया की माँ भुगत रही | Nirbhaya Case

मौज में दुष्कर्मी की सजा न्यायव्यवस्था नहीं, निर्भया की माँ भुगत रही | Nirbhaya Caseपुरानी फिल्मों में अक्सर आपने देखा होगा कि जब विलेन हीरो से नही निपट पाता तब वो उसकी माँ, बहन या प्रेमिका का अपहरण कर लेता है। ऐसी स्थिति में हीरो को मजबूर होना पड़ जाता है विलेन की बात मानने के लिए। हालांकि कई बार इसका उल्टा भी होता है। जैसे फ़िल्म 'शोले' में वीरू को बांध दिया जाता है तो बसंती को जबरन गब्बर सिंग के सामने नाचना पड़ता है। ऐसे दृश्य भावनात्मक रूप से दर्शकों को झकझोर देतें है। लेकिन फिल्में भी असल जिंदगी से ही निकलती है।#Nirbhaya #NirbhayaCase #nirbhayaconvicts #JusticeforNirbhaya #nirbhayabetrayed #NirbhayaVerdict

Talented India News द्वारा इस दिन पोस्ट की गई शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

निर्भया (Cartoon On Nirbhaya Case) के साथ जो ‘जघन्यता’ हुई उससे निर्भया के दर्द तो मौत के साथ खत्म हो गए लेकिन उसके माँ-बाप को जो दर्द बीते 7 सालों से लगातार मिलते आ रहे है, उसका कोई अनुमान भी नही लगा सकता। कल्पना कीजिये आप एक बार की क्या बीत रही होगी उन माँ-बाप के ऊपर जो अपनी बेटी को 7 साल बाद भी इंसाफ नही दिला पा रहे है। ऐसे फैसले सुनकर उनकी आंखों के आगे अंधेरा नही छा गया होगा? उनका खून नही खौल गया होगा जब बलात्कारियों के वकील ने उनसे कहा कि अनंतकाल तक भी मैं दोषियो को फांसी नही होने दूंगा?न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी बंधी है लेकिन कान तो ये बातें सुन रहे होंगे न? बलात्कारियों (Cartoon On Nirbhaya Case) के वकील के ये बेशर्म शब्द गर्म लावा बनकर उनके कानों में नही घुसे होंगे? इस परिस्थिति के लिए किसे दोषी ठहराया जाए? वकील को, जज को, न्याय तंत्र को या फिर निर्भया के माता-पिता की किस्मत को? इन दोनों के आंसू देखकर लगता है कि इस देश मे सबसे बड़ा गुनाह है तो एक लड़की का माता-पिता होना। न्यायव्यवस्था से जुड़े लोगों में कोई संवेदना बची है या नही? कैसे लौग है ये जो बलात्कार पीड़िता के परिवार की जगह हैवानों के साथ खड़े हुए है?न्याय पालिका को खुद का ये कायरपन क्या दिखाई नही देता? आरोपी फांसी से बचने के लिए लगातार तरकीबें भिड़ा रहे है और जज साहब के पास हर बार फांसी की सज़ा टालने के अलावा कोई विकल्प नही बचता। इतनी लाचार न्याय व्यवस्था के होते देश मे बलात्कार भला कैसे रुक सकतें है? जब भी निर्भया मामले पर कुछ कहना होता है तो मन में एक दबी सी उम्मीद होती है कि ये आखिरी बार होगा, इसके बाद दरिंदो को फांसी की सज़ा मिलने के बाद ही कुछ कहा जाएगा। लेकिन ये उम्मीद भी अब दम तोड़ने लगी है।निर्भया जैसे मामले में, जिस पर पूरे देश की नज़र हो, न्याय व्यवस्था को ऐसा निर्णय देना चाहिए था जिससे बलात्कारी (Cartoon On Nirbhaya Case) कांप जाए। अगली बार कोई ऐसा काम करने की सोचे भी ना। लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा। बलात्कारियों के दांवपेच कानून पर भारी पड़ रहे है। संदेश ये जा रहा है कि बलात्कारियों को सज़ा देने के मामले में न्यायतंत्र में हिम्मत, काबिलयत और नीयत, तीनो की ही अत्यधिक कमी है। ऐसी न्याय व्यवस्था पर धिक्कार है।

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Sachin Pauranik

 

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