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Talented View : उन्हें परेशान करने का भी उन्हें कोई हक़ नहीं बनता

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प्रसिद्ध छायाकार केविन कार्टर ने 1993 में एक तस्वीर खींची थी। सूडान में भयंकर अकाल के बीच एक बच्ची आखिरी सांसें गिन रही थी और पास ही एक गिद्ध उसकी मौत का इंतज़ार कर रहा था। इस तस्वीर को “पुलित्ज़र अवॉर्ड” से नवाज़ा गया था, लेकिन कार्टर ने कुछ दिनों बाद अवसाद से ग्रस्त होकर आत्महत्या कर ली थी क्योंकि उन्होंने बजाय उस बच्ची को बचाने के सिर्फ तस्वीर लेकर ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली थी। सही भी है, छायाकार हो या पत्रकार, आखिर सबसे पहले तो हम सब इंसान हैं और इंसानियत हमारा सबसे पहला कर्तव्य है।

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बिहार के मासूमों पर चमकी बुखार कहर ढा रहा है। अस्पतालों में बच्चे दम तोड़ रहे हैं, लेकिन देश के नेता और पत्रकार यहां भी अपनी गंदी हरकतों से बाज़ नहीं आ रहे हैं। दिल्ली से बिहार पहुंचे पत्रकार (खबरिया दलाल) सीधे अस्पतालों में पहुंचकर डॉक्टरों से सवाल-जवाब कर रहे हैं। सस्ती टीआरपी बटोरने के लिए ये पत्रकार अस्पतालों में अव्यवस्था फैला रहे हैं। इन्हें असल में न बच्चों की फिक्र है, न उनके परिजन की और न ही अन्य मरीजों की। इन्हें फिक्र है सिर्फ अपनी ‘टीआरपी’ की। पहले से काम का दबाव झेल रहे डॉक्टरों से ये ऐसे रुबाब से सवाल पूछ रहे हैं मानो ये कलेक्टर हों।

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संवेदना शून्य हो चुके ये पत्रकार नाज़ुक दौर में अस्पतालों और डॉक्टरों पर निशाना साध रहे हैं। डॉक्टरों के काम में ये लोग जानबूझकर अड़ंगा डाल रहे हैं। इन लोगों के अनावश्यक हस्तक्षेप से डॉक्टर भी अपना काम भी ठीक से नहीं कर पा रहे हैं। बड़े-बड़े नामदार पत्रकार इतना नीचे गिरकर काम कर रहे हैं कि लगता ही नहीं कि इनमें मानवता ज़िन्दा है। लाखों-करोड़ों के पैकेज पाने वाले ये पत्रकार भी किसी गिद्ध से कम नहीं है। इनके लिए बच्चों की मौत भी मज़ाक ही है। इधर, नेताओं का तो कहना ही क्या। सुशासन बाबू उर्फ नीतीश कुमार के मुंह से संवेदना के दो शब्द नहीं निकल रहे हैं ।

इधर, उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ऐसे समय में विपक्ष से सवाल पूछ रहे हैं कि उन्होंने अपने शासन में कितने अस्पताल बनवाए ? 15 साल से लगातार राज़ करने वाले सत्ताधीशों का आज भी राज्य की बदहाली के लिए विपक्ष पर निशाना साधना हैरान करता है। खुद की नाकामी का ठीकरा दूसरों पर कैसे फोड़ा जा सकता है| इसमें हमारे नेता पीएचडी कर चुके हैं। ‘चमकी’ से मरने वाले सभी बच्चे गरीब परिवारों के हैं। अब तक 150 से ज्यादा बच्चे दम तोड़ चुके हैं और उसके बाद भी हालात जस के तस हैं। अमीरों के 2 बच्चे भी मर जाते तो अब तक डॉक्टरों से लेकर अस्पताल तक नप जाते, लेकिन गरीब के बच्चों की सिसकियां भला कौन सुनता है? 100 बच्चे मरे, तब जाकर मीडिया को पता चला कि बिहार में कुछ गड़बड़ है। नहीं तो गरीब के बच्चों की जान की किसे फिक्र है?

तैमूर की चड्डी का रंग भी जहां अखबारों की सुर्खियां बन जाता है वहीं बेचारे गरीब के बच्चों की मौत पर भी किसी के कान पर जूं नहीं रेंगती। बिहार में दम तोड़ते बच्चे हमारे विकास के दावों को मुंह चिड़ा रहे हैं। देश का भविष्य उज्ज्वल कैसे हो सकता है, जब हम बच्चों को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं ही नहीं दे पा रहे हैं । ऊपर से नेता, पत्रकार हालात संभालने के बजाय गिद्ध बने हुए हैं। संवेदनाशून्य हो चुके इन पत्रकारों और नेताओं को एक बार रुककर सोचना चाहिए कि सबसे पहले वे एक इंसान है। यदि वे किसी बच्चे की मदद नहीं कर पा रहे हैं तो कम से कम जो उनकी मदद कर रहे हैं, उन्हें परेशान करने का भी उन्हें कोई हक़ नहीं बनता।

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