Talented View :  सद्भावना की मिसाल या दिखावा ?

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कई घटनाएं ऐसी होती है, जो ऊपर से देखने पर कुछ अलग दिखाई देती है, लेकिन थोड़ा भीतर तक देखने पर कुछ और ही तस्वीर सामने आती है। ऐसी ही एक खबर आज सुर्खियों में छायी हुई है कि एक कश्मीरी पंडित के अंतिम संस्कार में लोकल कश्मीरियों ने मदद की। कश्मीर के कुलगाम में रहने वाले 84 वर्षीय बुज़ुर्ग जानकीनाथ की मृत्यु हो जाने पर आसपास के मुस्लिमों ने उनकी अन्तिम यात्रा की तैयारी की और उनके रिश्तेदारों को लेने के लिये गाड़ियाँ भी पहुंचाई।

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जानकीनाथ की मृत्यु हुई तब उनके साथ उनका एक पुत्र ही था। उसकी इच्छा थी कि जम्मू ले जाकर पिता का अंतिम संस्कार किया जाए। लेकिन जब पड़ोसियों को इसकी जानकारी लगी तो उन्होंने सारी तैयारियां खुद की औऱ कुलगाम में ही नाथ कि अन्तिम यात्रा का पूरा प्रबंध किया। मुस्लिमों द्वारा किये गए इस नेक कार्य को मीडिया कश्मीरियत, इंसानियत और सद्भाव की मिसाल के तौर पर प्रस्तुत कर रही है।

यकीनन ये वाकया सद्भावना की मिसाल है भी, लेकिन एक घटना से 90 के दशक में हुए कश्मीरी पंडितों के वीभत्स नरसंहार को भुलाया नही जा सकता। काश ये सद्भावना कश्मीर के निवासियों द्वारा उस वक्त भी दिखाई जाती जब कश्मीरी पंडितों को अपने घरों से भगाया जा रहा था। जब कश्मीरी पण्डितों को अपनी महिलाओं और घरों को छोड़कर घाटी खाली करने को कहा गया था तब ये सद्भावना जाने कहाँ चली गयी थी? पूरे पंडित समाज पर जो जुल्म जिहादियों द्वारा किये, तब अगर ये कश्मीरी अपने भाइयों के लिए आगे आते तो हालात क्या इतने खराब होते?

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कश्मीरी पंडित आज भी तंबुओं में अपना विस्थापित जीवन जीने को मजबूर है इसका जिम्मेदार कौन है? अपने ही घरों से बेकसूरों को भगाने का पाप किसने किया? कश्मीरी पंडित जो खुद सद्भावना, प्रेम और भाईचारे की मिसाल थे, उन्हें अपनी ज़मीन से भगाने वाले जिहादियों का साथ देकर कश्मीरियों ने कौन सी सद्भावना की मिसाल दी थी? एक बुजुर्ग पंडित की अंतिम यात्रा की व्यवस्था करने पर कश्मीरियों को शांति का दूत बताया जा रहा है। लेकिन सोचने वाली बात है कि क्या कोई पंडित अपने घर की महिलाओं के साथ घाटी में सुरक्षित रह पाता?

सवाल है कि यही जानकीनाथ अपनी जवान बेटी के साथ क्या कुलगाम में इतने साल सुरक्षित रह पाते? क्या हिन्दू महिलाएं आज भी घाटी में कश्मीरियो के बीच सुरक्षित है? इसका जवाब सब जानतें है लेकिन भाईचारे की पुंगी बजाने से फुरसत मिले तभी तो असल हालात दिखाई देंगे। मीडिया एक सुर में इस घटना को कश्मीरियत और भाईचारे की मिसाल बताने पर तुली है।

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भाईचारे की बातें होनी चाहिये, लेकिन भाइचारे के चक्कर में अंधा हों जाना भी समझदारी नही है। भाईचारा अच्छी बात है लेकिन किसी घटना पर प्रशंसा के गीत गाने से पहले धरातल के हालातों पर भी एक नज़र डाल लेनी चाहिए।

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