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ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकें

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गलतियां सभी से होती हैं। इंसान यदि गलतियां नहीं करेगा तो कौन करेगा ?  इंसान है ही गलतियों का पुतला। इसलिए कहते हैं कि गलती करने में कोई बुराई नहीं है, बुराई है उससे सबक न सीखने में। हर गलती को भूल जाना चाहिए, लेकिन उससे सीखा हुआ सबक याद रखना चाहिए। एक ही तरह की गलतियों को बार-बार करते रहना समझदारी कतई नहीं है। पुरानी गलतियां दोहराना यह दर्शाता है कि हम कुछ सीखने को तैयार नहीं है ( Mumbai CST bridge collapse)।

जिस पल इंसान के अंदर कुछ नया सीखने की इच्छा मर जाती है, वह खुद भी मर जाता है। कल मुंबई में फिर एक फुट ओवरब्रिज गिर गया और फिर कुछ बेकसूर काल के गाल में समा गए। हमारी बातें भी वहीं की वहीं हैं। जांच करवाएंगे, उच्च स्तरीय जांच करवाएंगे, आश्वासन देंगे, मदद का ऐलान करेंगे, दोषियों को नहीं बख्शने की बातें भी होंगी, लेकिन कुछ दिन बाद सब भुला दिया जाएगा। कोई पलटकर पूछता भी तो नहीं कि जांच का क्या हुआ? कोई दोषी पाया गया भी या नहीं? किसी को सज़ा तो दूर की बात, जांच पूरी हुई या नहीं इसकी भी कोई फिक्र नहीं करता है। क्षणिक आक्रोश और दु:ख के बीच मरने वालों के नाम भी बहुत जल्द भुला दिए जाएंगे। घायलों की परवाह वैसे ही किसी को नहीं है। सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज के बाद उन्हें भी कोई पूछने वाला नहीं है। वह खुद भी इसी से खुश है कि कम से कम जिंदा तो बचे।

इधर, घटना के बाद से नेता अपने काम पर लग गए हैं। सत्ता वाले नेता हादसे पर राजनीति न करने की बातें कर रहे हैं और विपक्ष वाले नेता इसे सरकारी लापरवाही बतलाने पर तुले हैं। कुछ नेताओं ने मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक का भी इस्तीफा मांग लिया है मानो इस्तीफा ही समस्या का समाधान हो। मीडिया अपने काम में लगा है और हादसे से जुड़ी एक-एक खबर, वीडियो और जानकारियां जनता तक पहुंचा रहा है। मरने वालों के परिवार से लेकर घायलों का हाल तक मीडिया ने बताया है, लेकिन कब वह नए मुद्दे को लपक लेगा और इस हादसे को भुला देगा यह कुछ पक्का नहीं है (Mumbai Bridge Collapse)।

टीआरपी के खेल में संवेदनाओं का स्थान बचा ही कहां है?  खैर, उनकी भी मजबूरी है। भारत जैसे विशाल देश में रोज़ ही हादसे होते हैं और उन्हें तो हर हादसे को कवर करना है। एक ही घटना को लेकर वो बैठ नहीं सकते। जिसका कोई अपना इस हादसे में चला गया, वह इसे जीवनभर नहीं भूल पाएगा जबकि बाकी जनता के लिए अन्य खबरों की तरह यह भी एक खबर भर है, जिसे वे लंच, ब्रेकफास्ट करते-करते देख लिया करते हैं। दरअसल, ऐसे हादसों से देश में किसी को कोई फर्क पड़ता ही नहीं है। सब अपने काम में लगे हुए हैं।

कितने घायल हैं, कितने मरे हैं, इससे ही घटना के दायरे का अनुमान लगा लिया जाता है। 2-4 मौतों पर कोई ज्यादा जनाक्रोश नहीं पनपता यही हमारी तासीर हो गई है। मुंबई जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्र में यह घटना घटी है और गलती किसकी है, यह तय होने ही नहीं वाला है इसलिए इन बातों से इतर यह भी सोचा जा सकता है कि गलती चाहे किसी की भी हो, लेकिन गलती थी, यह पक्का है। अब कसूरवार को पकड़ने, उसे सज़ा दिलाने की बातें बहुत हो चुकी।

गलतियों से सबक सीखना और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। अब सिर्फ इस बात का इल्म रखते हुए हम काम करें कि आगे से ऐसी कोई दुर्घटना नहीं होगी, यही मृतकों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। मुंबई हादसे के सभी मृतकों को हमारी तरफ से श्रद्धांजलि और घायलों के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना..!

-सचिन पौराणिक

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