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Talented View : पुलिस की कार्यप्रणाली गुंडों जैसी नहीं होनी चाहिए

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दिल्ली के मुखर्जी नगर का वीडियो चौंकाने वाला है। एक सिख पिता-पुत्र के साथ दिल्ली पुलिस का रवैया चिंताजनक है। यह घटना देखकर एक ही बात समझ में आती है कि हमारी पुलिस कितनी अप्रशिक्षित और गैर-पेशेवर है। पुलिस के जवानों को ऐसी परिस्थितियां संभालने की कोई जानकारी और अनुभव होता ही नहीं है।

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Today Cartoon Delhi Mukherjee Nagar Sikh Ruckus

जैसे मुखर्जी नगर में जब सिख ने अपनी कृपाण निकालकर पुलिस वालों को धमकाया तो ये बेचारे समझ ही नहीं पाए कि अब करना क्या है ? कुछ न सूझता देख पुलिस वाले जान बचाकर भाग खड़े हुए। इसके बाद भी उन्हें समझ नहीं आया कि करना क्या है ? इसलिए उन्होंने “गली के गुंडों” की तरह अपने साथियों को बुलाया और फिर इकट्ठे होकर फिर से पिता-पुत्र पर हमला किया। वीडियो देखकर सहज ही समझ आ जाता है कि हमारी पुलिस की कार्यप्रणाली गुंडों से ही प्रेरित है। पुलिस वाले अपने साथियों को बुलाते, उससे पहले यदि सिख समुदाय के 100-200 लोग वहां एकत्रित हो जाते तो पुलिस की फिर ‘घिग्घी’ बंध जाती। भीड़ के सामने हमारी पुलिस निरी लाचार है।

इसका नज़ारा कुछ दिन पूर्व दिल्ली में ही देखने को मिला था, जब मुस्लिमों के समूह ने दिल्ली में बसों पर पत्थरबाज़ी और तोड़फोड़ की थी। तब पुलिस वहां मौजूद थी, लेकिन उनकी हिम्मत नहीं थी कि भीड़ को रोक पाए, लेकिन सिख पिता-पुत्र को अकेले देखकर दिल्ली पुलिस की मर्दानगी जाग उठी। उन्होंने लाठी-जूतों से उनकी बर्बर पिटाई कर दी और घसीटते हुए थाने ले गए। इस घटना की जानकारी सिख समुदाय को लगी तो उन्होंने थाना घेर लिया। फिर जैसा होना था भीड़ के आगे पुलिस की लाचारी एक बार फिर सामने आई। भीड़ ने पुलिस के वाहन तोड़े और उनके बड़े अधिकारी तक को पीट दिया।

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थाने के सामने अपने एसीपी की पिटाई भी पुलिस नहीं रोक पाई। उल्टे पुलिस ने घटना में शामिल 3 पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया, लेकिन सिख समुदाय इस कार्रवाई को ‘नाकाफ़ी’ मान रहा है। उनकी मांग है कि वीडियो में दिखाई दे रहे सभी पुलिसकर्मियों को सस्पेंड किया जाए और उन पर धारा 307, धार्मिक भावना आहत करने का केस भी दर्ज किया जाए। कल रात थाने को एक बार फिर सिख समुदाय के लोगों ने घेर लिया था और पुलिस उन्हें समझाने की कोशिशें कर रही थीं।

अमेरिका में जब किसी कार सवार को पुलिस रुकने का इशारा करती है तो उसे तुरंत आदेश का पालन करना होता है। अपने हाथ स्टीयरिंग पर रखने होते हैं। हल्की सी शक की गुंजाइश होने पर पुलिस को गोली मारने का पूरा हक़ होता है। अमेरिका में पुलिस को अधिकार है और उनकी छवि भी साफ है क्योंकि वहां की पुलिस निश्चित तौर पर चौराहों पर खड़े होकर 100-200 रुपए नहीं वसूलती होगी। अपने यहां पुलिस किसी को रुकने का इशारा करती है तो अव्वल गाड़ी वाला रुकता नहीं, दूसरे रुक भी गया तो खिड़की में से ही 500  के नोट बाहर करने पर 99% मामलों में पुलिस उससे एक शब्द नहीं पूछने वाली।

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आज हालात ऐसे हैं कि कोई व्यक्ति सड़क पर दरी बिछाकर नमाज़ पढ़ने बैठ जाता है तो पुलिस को समझ नहीं आता कि अब करना क्या है? दिल्ली की घटना में भी सिर्फ दिल्ली पुलिस दोषी नहीं है। सरदारजी को भी तलवार नहीं निकालनी चाहिए थी, लेकिन पुलिस ने जिस तरह से मामले को हैंडल किया, उससे पुलिस ज़रूर कटघरे में खड़ी हो गई है। पुलिस को अपने तौर-तरीके सुधारने और अच्छी ट्रेनिंग की सख्त आवश्यकता है । पुलिस की कार्यप्रणाली कम से कम गुंडों जैसी नहीं होनी चाहिए।

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