आप जनता को समझते क्या हैं ?

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जनता दोगली ही है ना… आजकल देश में एक नया ट्रेंड चल पड़ा है हिंदुओं को गालियां देने का। ये गालियां विशेषकर उन राज्यों के हिंदुओं को दी जाती है, जहां भाजपा चुनाव हार जाती है। ताज़ा मामला मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ का है। कांग्रेसमुक्त भारत के नारे के बीच अचानक ये तीनों राज्य ‘भाजपामुक्त’ हो गए हैं। इस करारी पराजय पर आत्मावलोकन और मंथन की जगह भाजपा के सोशल मीडिया वाले भक्त हिंदुओं को गालियां देकर अपनी भड़ास मिटाने में लग गए हैं। यहां के हिंदुओं को जयचंद, गद्दार, दोगले जैसे विशेषणों से नवाज़ा जा रहा है।

मजेदार बात यह है कि गालियां देने वाले खुद को कट्टर भाजपा समर्थक और मोदीभक्त समझते हैं। भक्तगणों की माने तो इन तीनों राज्यों में कांग्रेस सरकार बनते ही इस्लामी शरीय कानून जैसे हालात हो जाएंगे और हिंदुओं का रहना मुश्किल हो जाएगा, लेकिन जैसे ही इनसे पलटकर पूछा जाता है कि भाजपा की सरकारों ने इतने साल में हिंदुत्व के लिए क्या किया तो इन्हें सांप सूंघ जाता है। विकास के कुछ थोथे दावों के अलावा कुछ इनसे बोलते नहीं बनता। ऐसे में प्रश्न उठता है कि चुनाव हारने के बाद ही भाजपा को हिंदुत्व क्यों याद आता है? सत्ता में रहने पर इन्हें “सबका साथ-सबका विकास” करना होता है, लेकिन चुनाव हारते ही इन्हें सिर्फ हिंदुओं की फिक्र क्यों हो जाती है? यदि हिंदुत्व ही आपका मुद्दा है तो एक काम गिना दीजिये सिर्फ हिंदुओं को फायदा मिला हो।

सत्ता में रहते धर्मनिरपेक्षता का राग अलापना और सत्ता से बाहर होते ही हिंदुत्व की ढपली बजाना सही मायनों में दोगलापन है। दोगली, जयचंद और गद्दार भाजपा को हराने वाली जनता नहीं बल्कि वह पार्टी है, जो सत्ता की मलाई खाने में अपने बुनियादी वादों को ही भूल जाती है। राम मन्दिर की बात करें तो साढ़े चार साल की पूर्ण बहुमत की भाजपा सरकार में अब भी हिम्मत नहीं है कि अध्यादेश लाकर मंदिर निर्माण कर दें। सबरीमाला में हिंदुओं की आस्था से खिलवाड़ किया जा रहा है, लेकिन यह सरकार वहां भी अध्यादेश नहीं लाएगी, लेकिन ये तब ज़रूर अध्यादेश तुरंत ले आएंगे, जब मामला वोटबैंक से जुड़ा हो।

दलित एट्रोसिटी एक्ट हो या जल्लीकट्टू की दौड़ हो, जहां सीधे मामला वोट से जुड़ता हो, वहां अध्यादेश तुरंत आ जाता है। यदि राम मन्दिर बन गया तो पार्टी अगला चुनाव किस मुद्दे पर लड़ेगी, यही सोचकर मंदिर निर्माण की दिशा में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया जा रहा है, लेकिन फिर भी दोगली तो जनता ही है ना..|

बात सिर्फ राममन्दिर की ही नहीं है। धारा 370 हो या समान नागरिक संहिता, इस सरकार ने हर बुनियादी मुद्दे को भुला दिया है। इस्लाम और मुसलमानों के नाम से हिंदुओं को डराने वाली पार्टी आखिर जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाकर समस्या का स्थायी समाधान क्यों नहीं करती जाता, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। तीन तलाक पीड़ित मुस्लिम महिलाओं की इन्हें फिक्र है, लेकिन तिरपाल में बैठे रामलला के दर्शन करने का इन्हें वक्त नहीं है। उस पर अपने वोटर को “माई का लाल” कहकर खुली चुनौती दी जाती है।

इन सबके बाद भी दोगली तो जनता ही है ना.. राम मन्दिर और हिंदुत्व की लहर पर सवारी करके आप दिल्ली तक पहुंचे, 2002 के बाद हिन्दू हृदय सम्राट की छवि लेकर आप सिंहासन पर बैठे, लेकिन अगले साढ़े चार सालों में आपको न अपने वादे याद आए न अपनी छवि। इसके उलट आपने तुष्टिकरण करते-करते अपने मतदाताओं को ही निपटाना शुरू कर दिया। राम को गाली देने वालों को आपने पार्टी में शामिल कराया, गौरक्षकों को गुंडा कहा, लेकिन चाहे जो हो जाए आप देशभक्त थे, हैं और रहेंगे। जनता का क्या है वो तो दोगली ही है ना..

-सचिन पौराणिक

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