Talented View : 6 महीने में ही सत्ता विरोधी लहर से जूझने लगी कांग्रेस

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किसी भी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या होती है ? जनता के लिए योजनाएं, व्यवस्थित प्रशासन या फिर लोकलुभावन स्कीमें ? नहीं। सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि ये होती है कि अपने ख़िलाफ़ जनता में माहौल न बनने देना। दूसरे शब्दों में किसी सरकार की सबसे बड़ी खूबी यह होती है कि वह अपने ‘हनीमून पीरियड’ को ज्यादा से ज्यादा लंबा खींच पाए। जितना लंबा यह पीरियड होगा, जनता सरकार को उतना ही समय देने को इच्छुक होगी और जितनी जल्दी हनीमून पीरियड खत्म, समझो अब जनता बख्शने के मूड में नहीं है।

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मध्यप्रदेश में दिग्विजयसिंह ने 10 साल लगातार शासन किया, लेकिन आखिरी सालों में उन्होंने इतनी सत्ता विरोधी लहर कमाई कि उसके बाद के चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया। उसके बाद प्रदेश में लगातार 15 साल भाजपा सरकार रही और यही भाजपा की खूबी रही कि 15 सालों के बाद भी जनता ने उन्हें पूरी तरह नहीं नकारा।

कांग्रेस बेशक सत्ता में वापसी करने में कामयाब हुई, लेकिन उन्हें वैसी सफलता नहीं मिली, जिसकी वे उम्मीद कर रहे थे और कमलनाथ प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए, लेकिन उसके बाद से प्रदेश के हालात बेकाबू होते जा रहे हैं। सरप्लस बिजली के दावों के बीच प्रदेश की जनता बिजली कटौती से परेशान हो गई है।

भयंकर गर्मी में इस बिजली कटौती ने लोगों को दिग्विजयसिंह के ज़माने वाली कटौती याद दिला दी। कमलनाथ इन परिस्थितियों से निपटने में असहाय सिद्ध हुए। बिजली जाने पर अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर तक की धमकी देने के बाद भी बिजली कटौती बदस्तूर जारी है। ऐसे हालातों ने ही भाजपा को प्रदेशभर में “चिमनी यात्रा” निकालने का मौका दिया है।

कमलनाथ मुख्यमंत्री के तौर पर इतनी बुरी तरह फेल होंगे, इसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। कमलनाथ को बिजली सहित हर समस्या का एक ही समाधान नज़र आता है और वह है अधिकारियों के तबादले। हर दिन तबादलों की नई सूची जारी होती है, हर दिन सरप्लस बिजली के दावे किए जाते हैं और हर दिन अचानक बिजली गुल हो जाती है।

प्रदेश में भाजपा यूं ही 29 में से 28 सीटें नहीं जीत गई है। इसके पीछे कमलनाथ सरकार का नकारापन भी पूरी तरह जिम्मेदार है। जिम्मेदार तो इस हालत के लिये राहुल गांधी खुद भी हैं क्योंकि जनता को उम्मीद थी कि प्रदेश में इस बार मुख्यमंत्री कोई ‘युवा चेहरा’ बनेगा, लेकिन उन्होंने भी ‘अज्ञात’ कारणों से ज्योतिरादित्य की जगह बुजुर्ग कमलनाथ को राज्य की कमान थमा दी।

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राहुल गांधी की खुद जब पार्टी पर पकड़ नहीं है तो बेचारे कमलनाथ भी कैसे हालात संभाल पाएंगे? राजस्थान और मध्यप्रदेश में कांग्रेस की दुर्गति के श्रेय से राहुल गांधी खुद को अलग नहीं कर सकते हैं। प्रदेश में नई सरकार चुनने के बाद जनता को लग रहा था कि कांग्रेस के राज में हालात सुधरेंगे, लेकिन कुछ महीनों में ही जनता समझ गई कि सरकार चलाना इनके बूते का नहीं है।

ये लोग अपनी गलतियों से सीखना जानते ही नहीं। प्रशासन पर नकेल कसने के बजाय ये सरकार बिजली कटौती को भी भाजपा की चाल बताने में लगी रहती है। समझ नहीं आता कि भाजपा विपक्ष में रहते हुए भी इतना कुछ कर सकती है तो कांग्रेस वाले सत्ता में होते हुए भी इतने लाचार क्यों हैं ?

भाजपा कटौती करवा रही है मान लिया, लेकिन रोज़ अधिकारियों के तबादले भी क्या भाजपा ही कर रही है? एक चुनी हुई सरकार का यह कैसा गैर-जिम्मेदाराना रवैया है? समूचे प्रदेश में की जा रही अघोषित बिजली कटौती ने जनता के मन में कमलनाथ में प्रति गुस्से को बहुत तेज़ी से भड़काया है। भाजपा 15 सालों में जनता की जितनी दुर्भावना नहीं कमा सकी, उससे ज्यादा कमलनाथ केवल 6 महीनों में कमा चुके हैं।

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दिल्ली की मोदी सरकार अपना दूसरा कार्यकाल शुरू होने के बाद भी जहां अपने ‘हनीमून पीरियड’ में ही है वहीं प्रदेश की कमलनाथ सरकार महज़ 6 महीने में ही सत्ता विरोधी लहर से जूझने लगी है। इतनी विरोध की भावना शिवराजसिंह के लगातार शासन के दौरान भी जनता में कभी नहीं उपजी। कांग्रेस सरकार हर मायने में प्रदेश में फेल होती जा रही है और उनके किसी नेता के पास इस परिस्थिति से निपटने का कोई इंतज़ाम नज़र नहीं आ रहा है।

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