नैतिक तानाबाना ध्वस्त हो जाएगा

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कोर्ट में ऐसे मामलों की आजकल बाढ़ आई हुई है, जिनमें महिला यह शिकायत दर्ज करवाती है कि शादी का झांसा देकर उसका यौन शोषण किया गया। ऐसे ही एक मामले में कोर्ट ने केस की व्यावहारिकता को समझते हुए यह टिप्पणी भी की थी कि आज के जमाने की मॉडर्न, पढ़ी-लिखी महिलाएं किसी झांसे में आ जाएं, यह बात कुछ हजम नहीं होती। कोर्ट की यह टिप्पणी सही थी क्योंकि जब से लिव-इन का चलन चला है, तब से इन मामलों ने तूल पकड़ा है।

जब तक महिला-पुरुष के बीच सबकुछ ठीक चलता है, तब तक कोई दिक्कत नहीं आती, लेकिन जैसे ही दोनों अलग होते हैं महिला को लगता है कि उसका शोषण कर लिया गया। तब मामला फिर पुलिस से होते हुए कोर्ट तक जा पहुंचता है। लिव इन जैसा फैसला पहले महिलाओं को 21वीं सदी की आधुनिकता और स्वच्छंदता से जुड़ा लगता है, लेकिन कुछ दिन बाद वे सारा दोष पुरुष के मत्थे मढ़ देती हैं और खुद विक्टिम बन जाती हैं। ऐसे ही शादी के बाद के संबंधों में भी आज तक होता आया है।

यदि कोई शादीशुदा पुरुष किसी अन्य शादीशुदा महिला से आपसी रजामंदी से संबंध बनाता था तो इसे व्यभिचार की श्रेणी में रखकर दंडनीय अपराध माना जाता था। इस केस में महिला का पति उस पुरुष के खिलाफ तो शिकायत दर्ज करवा सकता है, लेकिन अपनी पत्नी का कुछ नहीं कर सकता है वैसे ही उस पुरुष की पत्नी भी उस महिला के खिलाफ कोई शिकायत दर्ज नहीं करवा सकती है। केवल महिला का पति ही उस पुरुष के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाने का अधिकार रखता था। ऐसे मामलों में भारतीय दंड विधान 497 के मुताबिक महिला विक्टिम मानी जाती है जबकि पुरुष अपराधी।

इस कानून का साइड इफ़ेक्ट यह था कि पति की सहमति से पत्नी किसी गैर मर्द से संबंध बना सकती है। इस कानून का स्वरूप कुछ ऐसा था, जिसमें पुरुष पत्नी को अपनी संपत्ति समझता है और उसका चाहे जैसे उपयोग कर सकता है, लेकिन सवाल वही थे कि यदि आपसी सहमति से संबंध बनाए जाते हैं तो इसमें दोषी दोनों को ही होना चाहिए। सिर्फ पुरुष को अपराधी मान लेना एक प्रकार का भेदभाव है। कल देश की माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इस भेदभाव को खत्म करने की दिशा में एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए इस धारा को अवैध घोषित कर दिया।

हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ये संबंध गैरकानूनी भले न हो, लेकिन तलाक के लिए पुख्ता आधार ज़रूर माना जा सकता है। कोर्ट ने इसी के साथ यह साफ कर दिया कि एक ही अपराध के लिए दो व्यक्तियों में लैंगिक आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता है। यदि कोई अपराध है तो उसमें शामिल दोनों लोगों को सज़ा मिले अथवा एक को भी नहीं मिले, लेकिन इस फैसले के आते ही एक नई बहस शुरू हो चुकी है कि इससे समाज का नैतिक तानाबाना ध्वस्त हो जाएगा क्योंकि जो अब तक व्यभिचार माना जाता था, वह अब गैरकानूनी नहीं रह जाएगा।

अपने इस फैसले के साथ ही कोर्ट ने आधुनिकता की दिशा में समाज को एक कदम और आगे बढ़ाने की पहल कर दी है। कोर्ट का मानना है कि समाज को अब 21वीं सदी में आगे की तरफ कदम बढ़ाने पड़ेंगे, लेकिन सवाल है कि क्या समाज आगे बढ़ने को तैयार है? समाज पहले ही लिव-इन संबंधों से परेशान है और ऐसे में विवाहेत्तर संबंध भी यदि मान्य हो जाएंगे तो समाज आखिर किस दिशा में जाएगा?

कई बुद्धिजीवियों का मानना है कि यदि ऐसे ही आगे बढ़ते रहे तो फिर एक दिन समाज में वेश्यावृत्ति को भी कानूनी मान्यता मिल जाएगी। हमें यह बैठकर तय करना पड़ेगा कि आखिर हमें किस दिशा में जाना है और अभी हम किस तरफ जा रहे हैं, लेकिन यह बात तय है कि कोर्ट के इस फैसले के बाद यौन अपराधों के मामलों में लैंगिक आधार पर पुरुषों से भेदभाव कम हो जाएगा। समाज को भी अपनी मान्यताएं बदलनी होगी कि ऐसे मामलों में सिर्फ पुरुष ही दोषी होता है।

यदि कोई पति-पत्नी साथ में खुश नहीं है तो जीवन की गाड़ी को यूं ही ढोते रहना भी कहां तक सही है? ऐसा कोई रास्ता निकालना ही होगा, जहां दोनों खुश रह सकें। पहले की बात अलग थी और आज का ज़माना अलग है इसलिए ऐसे कानूनों में बदलाव का स्वागत किया जाना चाहिए।

-सचिन पौराणिक

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