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Talented View : घटनाओं को सांप्रदायिक चश्मे में बिल्कुल नहीं देखा जाए

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कुछ साल पहले रात को अचानक शोर-शराबा मचने लगा। बाहर आकर देखा तो भीड़ लगी हुई थी और एक शख्स को मिलकर सब पीट रहे थे। बाद में पता चला कि पास में रहने वाले शर्माजी 2 दिन से कहीं बाहर गए हुए थे। उनका घर खाली पड़ा था, लेकिन रात करीब 12.30 बजे उनके घर की लाइट अचानक जली और बंद हो गई। सामने रहने वाले पड़ोसी ने यह बात नोटिस कर ली। उन्होंने तुरंत भांप लिया कि शर्माजी के यहां चोर घुस आए हैं। उन्होंने तुरंत आसपास रहने वालों को सूचना दी और सभी डंडे लेकर तैयार हो गए। भीतर चोरों को भी समझ आ गया कि लोग जमा हो गए हैं इसलिए उन्होंने छत से छलांग लगा दी। एक चोर भागने में कामयाब हो गया, लेकिन दूसरे के पैर में चोट आई और वह पकड़ा गया।

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मोहल्लेवालों ने उसे पीटना शुरू किया ही था कि पुलिस आ गई। लोगों ने पुलिस के सामने भी चोर को पीटना जारी रखा। जनता के दबाव में पुलिस वाले ने कहा, “हम एक राउंड मारकर आते हैं, तब तक आप इसको पीट लो। जनता ने भी जब तक पुलिस दोबारा आई, तब तक उस चोर को भरपूर मज़ा चखाया।

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इस घटना के वर्णन करने का तात्पर्य इतना ही है कि चोरों को पीटना भारत की जनता के स्वभाव में है। चूंकि जनता के मन में यह होता है कि पुलिस चोरों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं करेगी इसलिए वे खुद ही अपना इंसाफ कर लेना चाहते हैं। देश के किसी भी कोने में चोर यदि पकड़ा जाता है तो जनता उसे पीटती है। झारखंड में जो हुआ, वह भी असल में भीड़ की इसी मानसिकता के कारण है। चोरी के आरोप में एक शख्स भीड़ के हत्थे चढ़ गया और भीड़ ने उसे भरपूर पीटा। अब भीड़ में हर तरह के लोग शामिल होते हैं।

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इस भीड़ में किसी ने उससे “जय श्रीराम” भी कहलवा लिया, लेकिन मूल घटना “लिंचिंग” की नहीं बल्कि चोरी की है। भीड़ कभी चोरों को पीटने से पहले उनका नाम, धर्म और मजहब नहीं पूछती। भीड़ के लिए चोर सिर्फ एक आरोपी होता है इसलिए मीडिया और ‘असहिष्णुता गैंग’ वालों को इस घटना को ऐसे ही देखना चाहिए। भीड़ के हाथों पीटने वाला अंसारी भी हो सकता है, गुप्ता भी और जोसेफ़ भी। इसमें धर्म-मजहब वाला एंगल कहीं शामिल ही नहीं है। यह देश का दुर्भाग्य है कि ऐसी साधारण घटना को भी साम्प्रदायिक रंग में रंगा जा रहा है। जनता की पिटाई के बाद पुलिस ने आरोपी का मेडिकल भी करवाया था, जिसमें उसे स्वस्थ बताया गया है।

आरोपी की मौत पुलिस कस्टडी में हुई है इसलिए इसकी जिम्मेदारी पुलिस के ऊपर है। पुलिस ने या तो मेडिकल सही से नहीं करवाया या फिर हिरासत में आरोपी को और पीटा गया, लेकिन तब भी यह मामला चोरी और पुलिसिया लापरवाही का ही कहलाएगा। इस घटना में धर्म-मजहब सिर्फ एक विशेष एजेंडे के तहत घुसाया जा रहा है। असल में यह घटना चोरी और भीड़ के गुस्से की एक सामान्य घटना है। ऐसी सैकड़ों घटनाएं देशभर में रोज़ होती हैं, लेकिन जानबूझकर सुर्खियां सिर्फ उन्ही घटनाओं को बनाया जाता है, जहां मार खाने वाला ‘मुस्लिम’ या ‘दलित’ होता है।

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इस घटना में असल दोषी प्रशासन है। भीड़ किसी को पीट रही है तो पुलिस क्या कर रही है? आरोपी की मौत भी मौके पर नहीं हुई है। उसे चिकित्सा सुविधा मिलती तो शायद उसकी जान बच भी जाती, लेकिन ऐसी विरली घटनाओं से भगवान राम के नाम को बदनाम करने का हक किसी को नही है। रामजी तो दया, प्रेम और क्षमा की मूर्ति है। उनके आदर्शों को मानने वाला किसी का बुरा सोच भी नही सकता। कुछ सिरफिरों की हरकत से राम के नाम और हिंदुत्व पर अंगुली नहीं उठाई जा सकती है । इस मामले में असली आरोपियों को सज़ा मिले, यह हम भी चाहते हैं लेकिन इस घटनाओं को सांप्रदायिक चश्मे में बिल्कुल नहीं देखा जाना चाहिए।

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