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ज़माना ऐसा आ गया है जहां सच को सीधे ही सच नही बोला जा सकता। क्योंकि सच की तासीर थोड़ी कड़वी होती है और कड़वी चीजें लोग बिल्कुल पसंद नही करतें। मसलन कंजूस को कंजूस नही कह सकते, बेईमान को बेईमान नही कह सकते और भ्रष्ट को भ्रष्ट नही कह सकते। कहने का मतलब है कि लोगों को आइना देखना पसंद नही है। ऐसा नही है कि आईना खराब है। बल्कि बात ये है कि खुद की गंदी सीरत पर कोई नज़र डालना ही नही चाहता।

ऐसी खराबी सिर्फ इंसानों में नही होती बल्कि कुछ समूह के समूह, महकमे के महकमें ही बेईमान होतें है। उदाहरण के तौर पर नगर निगम, कलेक्ट्रेट में सभी जानतें है कि बाबू बिना “लक्ष्मी दर्शन” के फ़ाइल को आगे बढ़ने नही देंगे। ऐसे ही भ्रष्टाचार में गले तक डूबे एक समूह है पटवारियों का। पटवारी भी बिना रिश्वत के एक काम नही करते। इन लोगों की मानसिकता ऐसी बन गयी है कि जो तनख्वाह इन्हें सरकार देती है वो काम करने की नही बल्कि कुर्सी तोड़ने की होती है। क्योंकि हर काम, जिसे करना इनका कर्तव्य होता है, के बदले इन्हें अलग से पैसे चाहिए होतें है।

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इन लोगो ने भ्रष्टाचार में इतनी मास्टरी हासिल कर रखी है कि बिना पैसे लिये ये अपने पिताजी का काम भी नही करते। लेकिन कोई इन्हें पलटकर भ्रष्ट कह दे, रिश्वतखोर कह दे तो इन्हें बुरा लग जाता है। आईने दिखाते ही इनकी भावनाएं आहत हो जाती हैं। पटवारियों की ऐसी ही भावनाएं आजकल मध्यप्रदेश में आहत हो रही है। और इन्हें आहत किया जा रहा है राज्य के मंत्री जीतू पटवारी द्वारा। ‘पटवारी’ शब्द पर आप मत जाइयेगा क्योंकि ये जीतू का सरनेम है, वो कोई पटवारी नही दरअसल राज्य के युवा और काबिल मंत्री है जो सच को बिना किसी लागलपेट के बोलने में यकीन रखते है।

जीतू पटवारी (Jitu Patwari) ने कुछ दिन पहले कह दिया कि राज्य के सारे के सारे पटवारी भ्रष्ट है। इसके बाद दिग्गी राजा ने भी कह दिया कि वास्तव में सब पटवारी बेईमान होतें है। ये सुनकर इन पटवारियों की भावना आहत हो गयी। इनका कहना था कि या तो ये नेता माफी मांगे नही तो हम हड़ताल करेंगे। नेताओं ने माफी मांगी नही, सो पटवारियों ने हड़ताल शुरू कर दी। लेकिन पटवारी हड़ताल पर जाकर बड़ी गलती कर रहे है। इन्हें ये इल्म ही नही है कि जनता भी यही मानती है कि ये लोग सब भ्रष्ट है और इनके लिए लेशमात्र भी सहानुभूति किसी के मन मे नही है।

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किसी ने पटवारियों को भ्रष्ट कह दिया है तो इन्हें हड़ताल पर जाने की बजाय ये सोचना चाहिए कि आखिर इसमें गलत क्या कहा गया है? आप भ्रष्ट है तो है। ज़मीन की नपती में रिश्वत लेना, मुआवज़ा दिलवाने के नाम पर रिश्वत लेना, फसलों की नुकसानी में रिश्वत लेना। ऐसा एक काम नही है जो करने में पटवारी रिश्वत नही लेते। इन सबके बावजूद इन लोगों का साहस देखिये, भ्रष्टाचार में पीएचडी करने के बाद भी इन्हें लगता है कोई इन्हें भ्रष्ट न कहे। सवाल है इन्हें भ्रष्ट न कहें तो क्या कहें?

जीतू पटवारी और दिग्विजय ने बिल्कुल ठीक कहा है। भ्रष्ट को भ्रष्ट मानना भी पड़ेगा, स्वीकारना भी पड़ेगा और कहना भी पड़ेगा। पटवारियों को बुरा मानने और हड़ताल पर जाने की बजाय अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। आपके कर्म ही ऐसे है तो सच्चाई का आईना आपको खराब लगेगा ही। जनता को भी एक कदम आगे बढ़कर हर भ्रष्ट अधिकारी के मुह पर कहना चाहिए कि तुम भ्रष्ट हो। भ्रष्टाचारी का अपमान और ईमानदारी का सम्मान जब सार्वजनिक रूप से होगा तभी भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई जा सकेगी।

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 – सचिन पौराणिक

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