Talented View : डगमगाई देश की आर्थिक स्थिति!

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अर्थशास्त्र अर्थात इकोनॉमिक्स बड़ा जटिल विषय है। अर्थशास्त्र चलता है आंकड़ो से और कहतें है कि आंकड़े झूठ भी बोलतें है, इन्हें तोड़-मरोड़कर भी पेश किया जा सकता है। हाल ही जीडीपी के आंकड़े देश के सामने आए है। हालांकि इन आंकड़ों के बारे में देश की ज्यादातर जनता कुछ जानती नही, लेकिन इतना सब समझ रहे है कि देश की अर्थव्यवस्था में सब कुछ ठीक नही चल रहा है।

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जीडीपी के साथ ही औद्योगिक और कृषि विकास दर के आंकड़े भी चिंताजनक है। सरकार भी इसे समझ रही है और स्थिति काबू में करने के लिए बैंकों का आपस मे विलय किया जा रहा है। देश की इकोनॉमी में ऐसे कदम दूरगामी दृष्टि से उठाने चाहिए। अब सरकार ने ये कदम उठाने से पहले क्या रिसर्च की है ये वो ही जाने। किन्तु इतना तय है कि देश की “आर्थिक सेहत” कमज़ोर है, इकोनॉमी एक बुरे दौर से गुज़र रही है।

पूरा देश इस मंदी की चपेट में है लेकिन इस परिस्थिति में भी कोई बेपरवाह है तो वो है सरकारी कर्मचारी। मंदी हो चाहे युद्ध हो चाहे देश की तिजोरी खाली हो जाये। ये लोग इन सब बातों से निश्चिंत होतें है। दिनभर बैठकर कुर्सी तोड़ने के भी सरकार इन्हें लाखों रुपये महीना देती है। नौकरी से इन्हें कोई निकाल नही सकता इसलिये ये लौग सिर्फ इतना ही काम करतें है जितना जरूरी होता है। इसलिए देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना है तो देश के तमाम महकमो का निजीकरण सबसे पहले करना होगा।

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उदाहरणार्थ आप भारतीय जीवन बीमा निगम की किसी शाखा में जाइये। इनके प्रीमियम के आंकड़ो के साथ इनके कर्मचारियों की संख्या पर एक नज़र डालिये। इनकी कार्यप्रणाली पर भी नज़र घुमाइए। इसके बाद किसी निजी क्षेत्र कि बीमा कम्पनी में जाइये, उनके कर्मचारियों की संख्या और कार्यप्रणाली देखिए। आप चौंक जाएंगे ये जानकर की भारतीय जीवन बीमा निगम से दस गुना छोटे कार्यालय, दस गुना कम कर्मचारियों और दस गुना कम तनख्वाह में ये कंपनियां निगम से बेहतर सेवाएं दे रही है। इनके प्लान और सेवाएं हर मामले में अव्वल है।

ऐसा ही सर्वे आप व्यक्तिगत तौर पर स्कूल, अस्पताल, बैंक और दूरसंचार विभाग में जाकर कर सकतें है। आप ये मानने पर मजबूर हो जाएंगे कि वाकई सरकारी कर्मचारी न सिर्फ कामचोर है बल्कि सरकारों पर एक बड़ा बोझ भी है। देश की अर्थव्यवस्था के लिये ये ढर्रा घातक है। रेलवे के ऐसे कई कर्मचारियों को मैं व्यक्तिगत तौर पर जानता हूँ जिनकी तनख्वाह लाखों में है लेकिन काम वो कुछ नही करते। आप भी सोचेंगे तो ऐसे कई नाम निकल आयेंगे जो अगर सरकारी नौकरी नही कर रहे होते तो उन्हें मार्केट में कोई 15 हजार रुपये की नौकरी भी नही देता।

ये गलतफहमी किसी को न हो कि निजी क्षेत्र में किसी का शोषण होता है या उन्नति के मौके कम मिलतें है। लेकिन निजी क्षेत्र में आपकी उन्नति सिर्फ काबिलियत और निरन्तर प्रयासों पर निर्भर करती है। यहां कभी आप कंपनी के “जमाई” नही बन सकतें। ऐसे कई लोगों को भी मैं जानता हूँ जिन्होंने अपनी काबिलियत से निजी क्षेत्र में उस मुकाम को हासिल किया है जहां कोई सरकारी कर्मचारी पहुंचने की सोच भी नही सकता। बिना किसी आरक्षण और भेदभाव के निजी क्षेत्र देश के युवाओं को रोज़गार दे रहा है और देश को आगे ले जा रहा है।

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बैंकों का विलय ठीक है, इसके परिणाम आने में समय लगेगा। लेकिन सरकारी कर्मचारियों से छुटकारा पाने की दिशा में भी सरकार को सोचना चाहिये। इसके अलावा निजी क्षेत्र को सरकार जितना मजबूत करेगी उतनी ही मजबूत देश की अर्थव्यवस्था होगी। आखिर ये उद्योगपति ही है जो प्रतिभा को अवसर देतें है और रोज़गार के मौके बनातें है। अगर सरकार की नीतियां उद्योगपतियों और पूंजीपतियों के खिलाफ है तो अंततः इसका हर्जाना जनता को ही भुगतना पड़ता है। देश को इस मंदी से सिर्फ निजी क्षेत्र बचा सकता है और इसी तरफ सरकार को सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।

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