Talented View : आजकल मनुष्य को हारना स्वीकार नहीं

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पहले के ज़माने में जब भी दो पक्षों में मतभेद, लड़ाई आदि होती थी तो एक पक्ष हारता था और एक पक्ष जीतता था। यदि बाज़ी सजी है, दांव लगा है तो निश्चित ही कोई जीतता था और कोई हारता था। जीतने वाला खुश होता है और हारने वाला स्वाभाविक तौर पर दुखी, लेकिन आजकल के मनुष्य की फितरत ऐसी हो गई है कि उसे हारना बिल्कुल पसंद नहीं। तमाम झूठे-सच्चे हथकंडे अपनाकर, सही-गलत, नैतिक-अनैतिक की परवाह किए बिना आज का इंसान सिर्फ जीतना चाहता है। यह शाश्वत सत्य है कि दांव लगा है तो किसी की जीत के साथ किसी को तो हारना ही पड़ेगा।

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आज परिस्थितियां ऐसी बनने लगी है कि हारने वाला हारकर भी अपनी हार स्वीकार नहीं करना चाहता है। अपनी हार को स्वीकार करने से अहंकार इतना चोटिल हो जाता है कि इंसान हार को स्वीकार करना भी भूल गया है। ऐसे में अपनी हार को परिभाषित करने के नए-नए दार्शनिक शब्द इंसान गढ़ता है। जीतने वाला कहता है कि वह जीता है, लेकिन हारने वाला कतई यह नहीं कहता कि वह पराजित हुआ है बल्कि कहता है की उसकी “नैतिक जीत” हुई है। मुझे तो ये “नैतिक जीत” का फंडा बिल्कुल समझ नहीं आता। हार गए हो तो उसे स्वीकार करो और आगे बढ़ो। हार को नैतिक जीत कहने से हार कोई जीत में तब्दील तो हो नहीं जाएगी। इस नैतिक जीत वाले दरअसल वे लोग होते हैं, जो हार तो जाते हैं, लेकिन उसे स्वीकार करने की हिम्मत नहीं कर पाते हैं। हारे हुए का सम्मान होना चाहिए, लेकिन इन ‘नैतिक जीत’ वालों को कायर कहना ही ठीक है क्योंकि इनको हार हजम ही नहीं होती।

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हालांकि इस “नैतिक जीत” से होता कुछ नहीं, लेकिन अहंकार को सहारा ज़रूर मिल जाता है कि हम हारे नहीं है बल्कि हम भी जीते हैं। ऐसा ही देश में आजकल चल रहा है। बंगाल में जारी घमासान के बीच सुप्रीम कोर्ट ने कोलकाता कमिश्नर को सीबीआई के सामने पेश होने का आदेश दिया। केंद्र इसे अपनी जीत बता रहा है, लेकिन ममता दीदी ने भी इसे अपनी नैतिक जीत बताते हुए धरना खत्म कर दिया। ऐसे ही अन्ना हजारे ने भी सातवें दिन अपना अनशन खत्म कर लिया।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के आश्वासन के बाद उन्होंने यह कदम उठाया। अंदर की बात यह है कि इस बार अन्ना कब अनशन पर बैठे, क्यों बैठे, किसके लिए बैठे, यह तक जनता को नहीं पता। न उन्हें जनता का समर्थन मिला और न ही सहानुभूति। मजबूरी में अन्ना के पास अनशन खत्म करने के अलावा कोई चारा बचा नहीं था। ज्यादातर जनता को अन्ना के अनशन की जानकारी ही तब मिली, जब उन्होंने अनशन समाप्त करने का ऐलान किया। ऐसे हालातों में अन्ना ने भी आश्वासन को ही अपनी ‘नैतिक जीत’ घोषित कर दी।

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महाभारत के युद्ध में पांडव जीते थे, कौरव हारे थे, लेकिन यदि आज के हालात में महाभारत होता तो कौरव कहते कि हम हारे नहीं, हमारी नैतिक जीत हुई है। रावण भी मरने से पहले लक्ष्मण को यही कहता कि मैं हारा नहीं हूं, यह मेरी ‘नैतिक जीत’ है। जीतना अच्छा है, लेकिन हारना भी बुरा नहीं है। बुरा अगर है तो सिर्फ अपनी हार को स्वीकार न करना। ‘नैतिक जीत’ प्राप्त करने से ‘करारी हार’ भी विनम्रतापूर्वक स्वीकार करना सौ गुना बेहतर है। लेकिन प्रतियोगिता के जमाने मे हारना आजकल पसंद किसे है? आगे भी ऐसी ‘नैतिक जीत’ के किस्से आगे भी सुनने को मिलते रहेंगे।

-सचिन पौराणिक

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