वोटबैंक की ओछी राजनीति से देश का सत्यानाश

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शहर में कहीं भी जब अवैध निर्माण होता है या झुग्गियां बनाकर लोग रहना शुरू करते हैं, तब प्रशासनिक अमला सोया रहता है। अवैध या फिर नजूल की भूमि पर लोग अवैध इमारतें बना देते हैं, फ्लैट बनाते हैं और फिर उन्हें बेच देते हैं। खरीदने वाला भी सस्ते के चक्कर में पड़कर अपनी खून-पसीने की कमाई दांव पर लगाकर एक आशियाना खरीद लेता है। फिर सालों बाद एक दिन अचानक कोई हादसा होता है और प्रशासन को याद आता है कि यह निर्माण अवैध है और फिर शुरू होती है अवैध निर्माण तोड़ने की कवायद। ऐसा ही कुछ आजकल असम में हो रहा है।

प्रशासन की इस कार्रवाई का वहां के लोग स्वाभाविक तौर पर विरोध करते हैं, हंगामा मचाते हैं, लेकिन अवैध निर्माण पर कानूनन उनका कोई हक़ नहीं होता। रहवासियों की दलील रहती है कि वे सालों से वहां रह रहे हैं, लेकिन प्रशासन के आगे वे बेबस हो जाते है। मतलब कहने का यही है कि यदि प्रशासन यही निर्माण शुरू होते वक्त ही सख्ती से रोक ले तो असली गुनहगारों को सज़ा भी मिले और बेकसूरों का नुकसान भी न हो।

ऐसा ही कुछ आजकल असम में हो रहा है। राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का अंतिम ड्राफ्ट कल जारी कर दिया गया। इसके मुताबिक 40 लाख आवेदकों के नाम सूची में नहीं है, जिससे इनके वजूद पर संकट मंडराने लगा है। इस मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों में जोरदार हंगामा हुआ और दोनों सदनों को स्थगित करना पड़ा। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस सहित विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार को जमकर कोसा और पूछा कि सिर्फ असम में ही ऐसा क्यों किया जा रहा है? हालांकि गृहमंत्री ने स्पष्ट कर दिया कि यह प्रारूप अंतिम नहीं है और जिनके नाम अभी शामिल नहीं किए गए हैं, वे दोबारा आवेदन कर सकते हैं।

गौर करने वाली बात यह है कि 1980 के दशक की शुरुआत में जब असम के मूल निवासियों ने घुसपैठियों और अवैध रूप से रहने वालों के खिलाफ उग्र आंदोलन चलाना शुरू किया, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने आंदोलन के नेताओं के साथ एक समझौता साइन किया था। इस समझौते का मुख्य बिंदु यह था कि 1971 के बाद असम में बसने वाले सभी विदेशियों को ढूंढा जाएगा और उनके सारे भारतीय दस्तावेज निरस्त किए जाएंगे। इसके बाद उनको देश से निष्कासित करने के व्यावहारिक कदम उठाए जाएंगे। हालांकि इस समझौते को मूर्तरूप देने के लिए सरकारों ने कोई इच्छाशक्ति नहीं दिखाई।

इस मुद्दे को विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने जोर-शोर से उठाया और सर्वानंद सोनोवाल ने कई बार कहा था कि इस समझौते को लागू करवाने के लिए वे भरपूर प्रयास करेंगे। इसका नतीजा यह हुआ कि भाजपा विधानसभा में प्रचंड बहुमत लाकर चुनाव जीती। अपने वादे के अनुसार, भाजपा ने जनसंख्या रजिस्टर के कार्य को तेज़ी से शुरू किया। दिक्कत यह है कि ये जो 40 लाख नाम काटे गए हैं, उनमें से ज्यादातर बांग्लादेशी मुस्लिम हैं, जो वर्तमान समय में पार्टियों के वोटबैंक बन चुके हैं इसलिए इनके अधिकार छीने जाने से उन्हें तकलीफ़ हो रही है।

असम समझौते के लगभग 3 दशक बाद अब इस लंबित कार्य को दृढ़संकल्प के साथ किया जा रहा है तो इसके लिए सरकार को साधुवाद देना चाहिए, लेकिन प्रशासन और सरकारें यही काम यदि 80 के दशक में ही निपटा लेती तो यह जख्म नासूर नहीं बनता। अतिक्रमण और अवैध निर्माण हटाने में जो विलम्ब स्थानीय प्रशासन की ओर से किया जाता है वही गलती केंद्र सरकारों ने बांग्लादेशी घुसपैठियों के केस में की है।

सबसे ज्यादा हैरानी की बात यह है कि ममता बनर्जी और कांग्रेस इसका विरोध कर रहे हैं। राजीव गांधी के अधूरे कार्य को वर्तमान सरकार पूरा कर रही है तो कांग्रेस को बेशर्त अपना समर्थन देना चाहिए। ममता बनर्जी का विरोध इसलिए समझ से परे है क्योंकि इस समझौते के वक्त वे कांग्रेस से ही सांसद थीं और तब उन्होंने कोई विरोध भी नहीं किया था, लेकिन अब बांग्लादेशी घुसपैठियों में जिस तरह से उन्होंने वोटबैंक तलाश लिया है, शायद उससे उन्हें अब घुसपैठियों से भी सहानुभूति हो रही है। वोटबैंक की ऐसी ओछी राजनीति ने ही देश का सत्यानाश किया हुआ है।

-सचिन पौराणिक

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