Talented View : केंद्र-राज्य में तकरार,लोकतंत्र तार-तार

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मध्यप्रदेश के एक बेहद ईमानदार पुलिस अधिकारी है- गौरव तिवारी। वर्तमान में पुलिस अधीक्षक के पद अपनी सेवाएं दे रहे गौरव तिवारी का छोटी सी प्रशासनिक उम्र में रुतबा बहुत बड़ा है। अपराधियों में तिवारी का खौफ इतना है की जहां इनकी पोस्टिंग होती है वहाँ अपराधी स्वतः अपने काले धंधे बंद करके अंडरग्राउंड हो जाते है। जिस शहर में एसपी बनकर तिवारी पहुंचते है वहां के नागरिकों को अभूतपूर्व खुशी और सुरक्षा का अहसास होता है। उसी तरह इनके तबादले पर जनता की आंखों में आंसू आ जाते है। लेकिन गौरव तिवारी की ईमानदारी का एक पक्ष ये भी है की सरकार से उनकी कभी नही बनती। बड़े अपराधियों को अक्सर राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है लेकिन तिवारी किसी के दबाव में नही आते। अपराधियों पर कठोर कार्यवाही वो लगातार करते है। किसी नेता या सरकार के दबाव में वो आते नही। नतीजतन उनका ट्रांसफर बहुत जल्दी-जल्दी हो जाता है। जब भी वो किसी बड़े घोटाले को उजागर करने के करीब पहुंचते है तभी उनका ट्रांसफर कर दिया जाता है। तिवारी के अलावा और भी कई ईमानदार अफसर ऐसे है जिनके नाम से भी भ्रष्ट नेता और अपराधी थर-थर कांपते है। लेकिन उनके साथ भी यही सलूक होता है-लगातार ट्रांसफर। हरियाणा के बहुचर्चित अधिकारी अशोक खेमका हो या मध्यप्रदेश के गौराव तिवारी,ये सभी ईमानदार अधिकारी हमेशा सरकार के निशाने पर रहते है। खेमका का अपनी सेवाओं के दौरान 50 से ज्यादा बार तबादला किया गया है। इधर तिवारी की पोस्टिंग भी राज्य सरकार बहुत सोच-विचारकर करती है क्योंकि ये अधिकारी अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से और निर्भीक होकर निभाते है।

Talented View : लोकतंत्र का रखवाला कौन ?

हर राज्य में कुछ ऐसे बिरले अधिकारी होते है लेकिन एक बात जो की सभी मे समान होती है वो ये की इन अधिकारियों की सरकार से कभी नही बनती। सरकार और ईमानदार अधिकारियों के बीच छत्तीस का आंकड़ा हमेशा रहता है। लेकिन अगर किसी राज्य में एक कथित ईमानदार अधिकारी को सीबीआइ की जांच से बचाने के लिये मुख्यमंत्री खुद धरने पर बैठ जाए तो इसे क्या कहें? क्या अधिकारी की ईमानदारी इससे सवालो के घेरे में नही आ जायेगी? प्रश्न नही उठेंगे की एक अधिकारी को सीबीआई से बचाने के लिये मुख्यमंत्री खुद क्यों धरने पर बैठ गयी? कोई अधिकारी या मुख्यमंत्री क्या देश की सर्वोच्च जांच संस्था से ऊपर है? अगर कोई अधिकारी सच में ईमानदार है तो वो किसी सरकार, सीबीआई से क्यों डरेगा? देर-सवेर ही सही लेकिन सच जीतता जरूर है। इसी विश्वास के दम पर देश के कुछ आईपीएस, आईएएस अधिकारी बिना किसी दबाव में आये अपनी ड्यूटी कर रहे है। कोई सरकार उनका कुछ नही बिगाड़ सकती सिवाय तबादले के। लेकिन अगर मुख्यमंत्री खुद संविधान, लोकतंत्र की परंपराओं को ध्वस्त करने में लगी है सिर्फ एक अधिकारी को बचाने के लिए तो शक की कुछ गुंजाइश छूट ही जाती है। अमूमन भ्रष्ट अधिकारीयों और सत्ता का चोली-दामन का साथ होता है। जबकि ईमानदार अधिकारी सरकार की आंखों में खटकते आये है। लेकिन जिस तरह की उल्टी गंगा बंगाल में दीदी द्वारा बहाई जा रही है उससे संकेत यही मिल रहे है की दाल में कुछ काला जरूर है।

Talented View : यह बजट सिर्फ एक लालच है…

सीबीआई अधिकारियों को पुलिस गिरफ्तार कर ले और सीबीआई दफ्तर को पुलिस से बचाने के लिए सीआरपीएफ बुलानी पड़े, ऐसी बातें देश मे पहले कभी नही सुनी गयी थी। इस सीधे टकराव के लिये केंद्र भी उतना ही दोषी है क्यूंकि ये सब केंद्र के इशारे पर हो रहा है ये बात सभी समझ रहे है। इधर मोदी-शाह की जोड़ी और सामने महागठबंधन के सब नेता मिलकर देश के लोकतंत्र को तार-तार करने पर अमादा है। मोदी-शाह डाल-डाल तो यहां बंगाल में दीदी पात-पात साबित हो रही है। इस नूराकुश्ती में देश समझ नही पा रहा है की इस खेल में कौन सही और कौन गलत है?

सचिन पौराणिक

Talented View : खुश होने की एक बड़ी वजह

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