Talented View : धोनी खुद ही टीम की हार के सूत्रधार बनते जा रहे

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कल रविवार था और इंडिया-इंग्लैंड के बीच क्रिकेट का मैच भी। रविवार को भारत के लोग वैसे भी इतने फुरसत में होते हैं कि शहर के किसी अनजान मंदिर में भी जाकर भंडारा जीम आते हैं और फिर यह तो क्रिकेट का विश्वकप है इसीलिए सभी तैयार होकर बैठ गए भारत-इंग्लैंड के मैच के लिए।

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समीकरण कुछ ऐसे थे कि भारत की जीत से हमें कोई विशेष खुशी नहीं मिलने वाली थी जबकि हार से पाकिस्तान का विश्वकप का सफ़र समाप्त होने वाला था इसलिए ऐसा दुर्लभ योग इस बार बना कि भारत वाले भारत की हार की प्रार्थना कर रहे थे और पाकिस्तान वाले भारत की जीत की इसलिए कल इंग्लैंड के चौके-छक्कों पर भी देश में जश्न मन रहा था। सभी के मनमुताबिक मैच का नतीजा भी आया और भारत यह मैच हार गया। मैच हम हारे, उसका कोई दुख नहीं, लेकिन जिस तरह से कल हारे, उससे खेलप्रेमियों में निराशा का भाव आ गया है।

धोनी और केदार जाधव ने जिस तरह अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया, वह देखना वाकई में एक दु:खद अनुभूति थी। कहने को हम भी अपना स्कोर 300 पार तक ले गए, लेकिन टीम में जुझारूपन बिल्कुल नज़र नहीं आया। जब टीम को 15 का रन रेट चाहिए हो और धोनी जैसा खिलाड़ी आराम से सिंगल ले रहा है, तब समझ नहीं आता कि टीम की यह आखिर कौन सी रणनीति है ? खेल में हार-जीत लगी रहती है, हार पर कोई ऐतराज भी नहीं है, लेकिन बिना लड़े, बिना कोशिश किए हथियार डाल देना बिल्कुल सही नहीं था।

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माना कि हर गेंद पर चौका-छक्का नहीं लगाया जा सकता किन्तु कोशिश तो की ही जा सकती है, लेकिन धोनी और यादव का तरह बेबसी भरा क्रिकेट देखकर लगा कि कहीं कुछ गड़बड़ ज़रूर है। 5 विकेट बचाकर बिना कोशिश किए पूरे 50 ओवर खेलने से बेहतर होता कि हम कोशिश करते और फिर भले ही पूरे ओवर नहीं खेल पाते। कल पहली बार भगवा जर्सी पहने हुए भारत खेल रहा था इसलिए महबूब मुफ़्ती जैसे पाकिस्तान परस्त नेताओं को भी अंगुली उठाने का मौका मिल गया।

महबूबा ने बेशर्मी से कहा कि भारत की जीत का सिलसिला टूटने की वजह भगवा जर्सी है। हालांकि महबूबा जैसी नेता की बात पर चर्चा तक करना नहीं चाहिए, लेकिन कहना होगा कि उनका बस चले तो वे भारत के खिलाड़ियों को हरा कुर्ता, ऊंचा पजामा और जालीदार टोपी पहनाकर मैदान में उतार दें।

महबूबा आजकल मुख्यमंत्री नहीं हैं, उनकी पार्टी में कोई सुन नहीं रहा है, फुरसत उनके पास भरपूर है इसलिए शायद वे रंगों और खेलों पर राजनीति कर रही हैं| बहरहाल, धोनी की कल की पारी देखकर विश्वास नहीं होता कि यह खिलाड़ी कभी गेंद को बाउंडरी पार पहुंचाने के लिए जाना जाता था। विश्वकप के बाद शायद धोनी संन्यास भी लेने वाले हैं। अच्छा होता कि वे इस शुभ कार्य के लिए विश्वकप का इंतज़ार नहीं करते । किसी भी खिलाड़ी को टीम की ताक़त बनना होता है न कि टीम पर एक बोझ। धोनी एक बेहद वरिष्ठ खिलाड़ी हैं इसलिए उन पर अंगुली उठाने की हिम्मत कोई नहीं करता, लेकिन ऐसा नही होना चाहिये।

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कुछ साल पहले गौतम गंभीर ने धोनी पर एक टिप्पणी की थी कि कई बार धोनी इतना धीमा खेलते हैं, जिससे दूसरे बल्लेबाज़ दबाव में आ जाते हैं।  बात सही भी है। धोनी दबाव को अच्छे से झेल जाते हैं, लेकिन बाकी खिलाड़ी ऐसे नहीं है। धोनी की इस तरह की बल्लेबाज़ी से टीम को कोई फायदा नहीं है। धोनी एक बेहतरीन खिलाड़ी रहे हैं, उनका क्रिकेट में योगदान अतुलनीय है, लेकिन अब लग रहा है कि उनका वक्त जा चुका है। अब वे टीम पर एक बोझ बनते जा रहे हैं। एक दौर था कि धोनी जब तक क्रीज़ पर डटे हैं, तब तक विरोधियों की सांसें रुकी रहती थीं। अब धोनी खुद ही टीम की हार के सूत्रधार बनते जा रहे हैं। धोनी निस्संदेह एक महान खिलाड़ी हैं, लेकिन महान खिलाड़ियों को भी संन्यास तो लेना ही पड़ता है।

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