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Talented View : वंशवाद तो सब बर्बाद

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“पुत्रमोह” सदियों से पतन का कारण बनता आया है। इसी मोह के चलते राजा धृतराष्ट्र ने पाण्डुपुत्रो के साथ अन्याय करते हुए अपने बेटे को सिंहासन सौंपना चाहा। इस अन्याय के चलते महाभारत जैसा महाविनाशकारी युद्ध धरती ने देखा। धृतराष्ट्र का पुत्रमोह प्रबल था इसलिए उसके परिणाम भी भयावह निकले। अब कलियुग में समय बदल गया है लेकिन पुत्रमोह आज भी वैसा का वैसा ही है। पहले पुत्र को राजा बनाने की जिद होती थी तो अब पुत्र को विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनाने की ज़िद होती है।

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पुत्रमोह का ताज़ातरीन उदाहरण महाराष्ट्र में देखने को मिल रहा है। आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाने के लिए शिवसेना ने आत्मघाती कदम उठाने में भी परहेज़ नही किया। समझ नही आता कि पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ने वाले आदित्य के पास ऐसी कौन सी काबिलियत है जिसके चलते उन्हें मुख्यमंत्री पद का दावेदार बताया जा रहा है? चांदी का चम्मच मुह में लेकर पैदा हुए, ज़मीन से कटे, अपरिपक्व, अनुभवहीन व्यक्ति को महाराष्ट्र जैसा राज्य कैसे सौंपा जा सकता है?

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पूरा देश समझ रहा है कि शिवसेना की मांग अव्यवहारिक है लेकिन उद्धव ठाकरे की आंखों पर बंधी ‘पुत्रमोह’ की पट्टी हटने का नाम नही ले रही। ऐसी पट्टी बालासाहब ठाकरे की आंखों में भी बंधी थी। क्योंकि अगर ऐसा नही होता तो शिवसेना की कमान आज उद्धव के हाथ मे नही बल्कि राज़ ठाकरे के हाथ मे होती। पुत्रमोह के ऐसे अनेक उदाहरणों से भारत की राजनीति भरी पड़ी है।

सोनिया गांधी ने राहुल को प्रधानमंत्री बनाने का सपना देखा और नतीजतन कांग्रेस आज अपने सबसे बुरे दौर से गुजरने को मजबूर है। उत्तरप्रदेश में मुलायम ने पुत्र अखिलेश को पार्टी की कमान सौंपी तो बेटे ने पार्टी का सत्यानाश कर डाला। अखिलेश न पार्टी को एकजुट रख सके और न ही परिवार को। कमजोर रजनीतिक अनुभव के चलते मायावती ने उन्हें लोकसभा चुनाव में बखूबी मूर्ख बनाया और खुद की सीटें बढ़वा ली। जबकि महागठबंधन के सूत्रधार अखिलेश वहीं के वहीं रह गए।

उधर बिहार में लालूपुत्रों का भी यही हाल है। इनसे भी न पार्टी सम्हल रही और न ही परिवार। लालू जेल में है और उनके नकारा बेटों को अय्याशी से ही फुरसत नही मिल रही है। वंशवाद की ऐसी ही नस्लें फारुख अब्दुल्ला, शरद पवार, प्रकाश सिंग बादल, करुणानिधि के परिवारों ने भी पाल रखी है। इनकी पार्टी में इनके परिवार के अलावा दूसरा कभी अध्यक्ष बनने की सोच भी नही सकता। देश मे लोकतंत्र के बीच ऐसी तस्वीरें सोचने पर मजबूर करती है।

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उपरोक्त सभी पार्टियों की दुर्दशा का असली जिम्मेदार सिर्फ पुत्रमोह और परिवारवाद है। काबिल व्यक्ति की जगह वंश को तवज़्ज़ो दी जाए तो पार्टी का पतन निश्चित होता है। समय बदल गया है। सतयुग, त्रेता, द्वापर के बाद कलियुग आ गया है लेकिन पुत्रमोह के कारण होने वाला विनाश शाश्वत है। धृतराष्ट्र की आंखे नही थी इसलिए हो सकता है उनका ‘मोह’ नैसर्गिक हो। किन्तु आंखों के होते हुए भी आज के नेता साफ नही देख पा रहे है। ‘पुत्रमोह’ का ये प्रकोप शिवसेना समेत बाकी पार्टियों को कहां ले जाएगा इसका उत्तर अब सिर्फ समय के ही पास है।

  – सचिन पौराणिक

 

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