Talented View : शिवसेना या व्यापारी

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सत्ता की भूख और कुर्सी की हवस नेताओं से क्या-क्या नही करवा लेती है? जब देश मे यूपीए की सरकार थी तब भाजपानीत एनडीए में भाजपा के अलावा मात्र 2 दल बचे थे। एक था शिरोमणि अकाली दल और दूसरी शिवसेना। राजनीतिक विश्लेषक ये मानने लगे थे कि शिवसेना और अकाली दल की विचारधारा कभी कांग्रेस से मेल नही खा सकती। उनकी बात में दम था क्योंकी बिना सत्ता के विपरीत परिस्थितियों में भी इन दो दलों ने कभी भाजपा से किनारा नही किया।

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लेकिन आज महाराष्ट्र में जो परिस्थितियां बन रही है उसे देखकर यही कहा जा सकता है कि विचारधारा, सिद्धांत, हिंदुत्व और नैतिकता की बातें सिर्फ दिखावा होती है। राजनीतिक तराजू में सत्ता का पलड़ा हमेशा नीतिगत ढकोसलों पर भारी रहता है। ऐसा सिर्फ शिवसेना के लिए नही कहा जा रहा है बल्कि सभी राजनीतिक दलों की कार्यशैली ऐसी ही है। कभी देशभक्त पार्टी भाजपा कश्मीर में महबूबा मुफ़्ती के साथ सरकार बना लेती है तो कभी सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर कांग्रेस से अलग होने वाले शरद पवार महाराष्ट्र में उनके ही साथ मिलकर  चुनाव लड़ते है।

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लगता है राजनीति में सत्ता की मलाई खाने के लिए आदर्शो, सिद्धांतो की बलि देनी ही पड़ती है। कैसा लगेगा जब एक-दुसरे के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले शिवसेना-एनसीपी साथ मिलकर महाराष्ट्र की सत्ता सम्हालेंगे? कांग्रेस सरकार में शामिल होगी या बाहर से समर्थन करेगी ये अभी स्पष्ट नही लेकिन, कांग्रेस-शिवसेना साथ आएंगे ये भी किसने सोचा था? शिवसेना के सर पर सत्ता का ऐसा नशा चढ़ा है कि कांग्रेस में उन्हें खूबियां नज़र आ रही है तो भाजपा में कमियां।
शिवसेना का कांग्रेस-एनसीपी के साथ मिलकर सरकार चलाना आग से खेलने जैसा है। महाराष्ट्र जैसे राज्य में तीन विरोधी विचारधारा के दलों का साथ आकर सत्ता चलाना आसान नही रहने वाला है। अगर सब ठीक रहा तो इस कदम से शिवसेना और एनसीपी ज़मीनी स्तर पर मजबूत होगी। लेकिन ऐसा होने की उम्मीद बेहद कम है। ज्यादा संभावनाएं इसी बात की है कि आपसी झगड़े और विचारधारा के टकराव के चलते ये सरकार बुरी तरह असफल होगी।
हिंदुत्व और मराठी मानुष की राजनीति करने वाली शिवसेना का वोटर उनके इस कदम से नाराज़ भी हो सकता है। ऐसा होता है तो शिवसेना को ‘शवसेना’ बनने में ज्यादा देर नही लगेगी। जनता ने जनादेश दिया है भाजपा-शिवसेना गठजोड़ को। लेकिन सत्ता सेना-एनसीपी-कांग्रेस के हाथ लगने से जनता में असंतोष भी फैल सकता है। शिवसेना के उलजुलूल बयानों और भड़ास से प्रेरित सामना में छपने वाले आर्टिकल को कांग्रेस-एनसीपी कितना झेल पातें है ये भी वक्त ही बतायेगा।
कुलमिलाकर शिवसेना का एनडीए से बाहर होना और सरकार गठन करना ऐसा कदम है जिसके दूरगामी परिणाम होंगे। भाजपा-कांग्रेस जैसी पूरे देश मे राजनीति करने वाली पार्टियों को इन कदम से ज्यादा फर्क नही पड़ेगा लेकिन कुछ गड़बड़ होने पर एनसीपी, शिवसेना जैसे क्षेत्रीय दलों का राजनीतिक वज़ूद ही मिट सकता है। महाराष्ट्र की राजनीति ये साफ इशारा दे रही है कि सत्ता के आगे सब सिद्धांत बौने हो जाते है। शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस का गठबंधन अंजाम तक पहुंचता है तो भारत की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुवात माना जायेगा।

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– सचिन पौराणिक
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