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Talented View  :  ख़ुद को ख़त्म करती कॉंग्रेस

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एक्जिट पोल के अनुमान सामने आने के बाद से एनसीपी, कांग्रेस और आईएनएलडी के नेताओं के बयान सुन रहा था। महाराष्ट्र एनसीपी के नेता प्रधानमंत्री मोदी के साथ कांग्रेस आलाकमान को भी इस संभावित हार का बराबर जिम्मेदार मान रहे है। इधर हरियाणा के नेता भी दबी जुबान में स्वीकार कर रहे है कि कांग्रेस नेतृत्व की सुस्ती ही हार की सबसे बड़ी वजह होगी। एनसीपी के नेता साफ कहते दिखे की हमारे नेता शरद पवार इस उम्र में भी विधानसभाओं में रैलियां करते रहे जबकि राहुल गांधी समेत कांग्रेस नेतृत्व ने चुनाव में कोई रुचि नही ली।

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हरियाणा में भी कांग्रेस का यही हाल रहा। हुड्डा के नेत्रत्व में कांग्रेस न ढंग से जनता के मुद्दे उठा पायी और न ही भाजपा के विकल्प के रूप में खुद को रख पाई। दोनो राज्यों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ होना तय है। हर चेनल के एक्जिट पोल के आंकड़े यही संदेश दे रहे है कि भाजपा की बंपर जीत निश्चित है। अंदरूनी कलह के साथ नेतृत्व के संकट से जूझ रही कांग्रेस के लिए ये नतीज़े किसी झटके की तरह नही है। कांग्रेस नेता चुनाव के पहले ही अपनी पराजय मान चुके थे।

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5 साल सत्ता में रहने के बाद ‘एन्टी-इनकंबेंसी’ याने की सत्ता विरोधी लहर से बचना किसी भी दल के लिए बड़ी चुनौती होता है। महाराष्ट्र और हरियाणा में भाजपा ने अपने कुशल चुनावी प्रबंधन से परिस्थितियों को अच्छे से सम्हाला। खुद प्रधानमंत्री द्वारा दोनो राज्यो में लगातार रैलियां करने से भाजपा उत्तरोत्तर मजबूत होती चली गयी। धारा 370 हटाने और सेना के शौर्य का भी चुनाव में भाजपा को फायदा मिला। इधर कांग्रेस के पास न ऐसा कोई चमत्कारिक वादा था, न नेता था और न ही चुनावी प्रबंधन था जिससे वो चुनाव जीत पाते।

ले-देकर लोकल नेताओं ने अपने स्तर पर चुनाव जीतने की कोशिश जरूर की, लेकिन भाजपा की प्रचंड राष्ट्रवाद की आंधी वो टीक नही सके। पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक, धारा 370 हटाने जैसे मुद्दें अगर जनता के बीच आ जाएं तो फिर विरोधी बेचारे मैदान में टीक भी कैसे सकते है? इन मुद्दों का कोई जवाब ही किसी के पास नही है। लोकल मुद्दों के ऊपर राष्ट्रीय मुद्दे जब-जब हावी होंगे भाजपा की जीत सुनिश्चित ही होगी।

2 दिन बाद जब असल नतीज़े आएंगे तब अगर कमोबेश यही तस्वीर बनती है तो भाजपा की दीवाली बन जाएगी और कांग्रेस का दिवाला। भाजपा कार्यालय में मिठाईयां बटेंगी, फटाखे फूटेंगे और कांग्रेस दफ्तरों पर सन्नाटा पसर जायेगा। उसके बाद कांग्रेस प्रवक्ता टीवी पर ये बतलाते नज़र आएंगे की भाजपा को पिछली बार की तुलना में नुकसान हुआ है, न्यूज़ एंकर उन्हें जबरदस्त धोएंगे, राहुल गांधी फिर कहीं विदेश यात्रा पर निकल जाएंगे, इसके बाद फिर कहीं चुनाव होंगे और फिर यही क्रम दोहराया जाएगा।

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अब तो लगता है कांग्रेस के लिए आत्मावलोकन का दौर भी समाप्त हो चुका है। कांग्रेस तिल-तिलकर दम तोड़ती जा रही है। कांग्रेस वो डूबता हुआ जहाज बन गयी है जिसमे सवार यात्रियों को अपना भविष्य साफ नजर आने लगा है। कांग्रेस के भविष्य को लेकर एक शेर याद आ रहा है जिसका जिक्र प्रधानमंत्री द्वारा 2018 में संसद में किया था। शेर मूलतः दीक्षित दनकौरी का है लेकिन चर्चा में ये प्रधानमंत्री द्वारा इस्तेमाल करने के बाद ही आया, शेर है:-

“न मांझी न रहबर न हक में हवाएं

है कश्ती भी जर्जर ये कैसा सफर है”

           – सचिन पौराणिक

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