Talented View : शिव की कमज़ोर सेना

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बड़ी पुरानी कहावत है – “हाथी चलता रहता है कुत्ते भौंकते रहतें है।” इस कहावत का किसी राजनीतिक किरदार से कोई लेनादेना नही है ये पहले ही स्पष्ट कर दूं। लेकिन ये कहावत महाराष्ट्र में चल रही सत्ता की उठापटक को देखकर ही याद आयी है। अपने युवा नेता आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाने और सत्ता में ढाई साल की बराबरी की हिस्सेदारी की मांग कर रही शिवसेना अपनी इन मांगों से कोई समझौता करने को तैयार नही दिखाई दे रही है।
शिवसेना कहने को महाराष्ट्र में नंबर 2 की पार्टी है लेकिन सीटों में वो एनसीपी, कांग्रेस से लगभग बराबर ही है। भाजपा इन तीनो दलों से निर्विवाद रूप से कहीं आगे है। लेकिन शिवसेना भाजपा को समर्थन के बदले ज्यादा से ज्यादा कीमत वसूलने की तैयारी कर रही है। हालांकि भाजपा भी इतनी सीधी नही है कि वो इन्हें मुख्यमंत्री सौंप दे, लेकिन इस गहमागहमी के बीच शिवसेना इस बार अपने रुख पर किसी तरह का समझौता करने को तैयार नही है।
आज भाजपा विधायक दल की बैठक होनी है जिसमे फड़नवीस को अपना नेता चुना जाएगा। उद्धव ठाकरे ने आज शिवसेना विधायक दल की बैठक बुलाई है। साथ ही भाजपा के साथ होने वाली बैठक भी उद्धव ने रद्द कर दी है। चुनाव नतीजों के दिन “आदित्य ठाकरे फ़ॉर सीएम” का ट्रेंड भी शिवसेना समर्थकों ने ट्विटर पर चलाया था। लेकिन जो परिस्थितियां बन रही है उन्हें देखकर लगता नही की शिवसेना कभी राज्य के मुख्यमंत्री पद तक पहुंच पायेगी।
शिवसेना की दिक्कत ये है कि वो एक क्षेत्रीय पार्टी है। महाराष्ट्र के बाहर उनका कोई नामलेवा नही है। इसके साथ ही महाराष्ट्र में उनकी ताकत लगातार कम होती जा रही है और भाजपा की बढ़ती जा रही है। मुख्यमंत्री पद मांगने के पीछे सेना की मंशा पार्टी को मजबूत करने की है। लेकिन विचारधारा के मामले में वो कांग्रेस या एनसीपी से समर्थन न ले सकती है न दे सकती है। ईसलिये उनके पास एकमात्र विकल्प भाजपा से मोलभाव और दबाव की राजनीति बचता है।
उनकी दबाव की ये राजनीति काम कर भी जाती अगर भाजपा का नेतृत्व अमित शाह के हाथ में नही होता। शाह शिवसेना की इन मजबूरियों से अच्छे से वाकिफ है और इसलिए वो उन्हें ज्यादा भाव बिल्कुल नही देंगे। शिवसेना गुस्सा दिखा सकती है, उलजुलूल बयान दे सकती है, ‘सामना’ में अपनी भड़ास निकाल सकती है लेकिन आखिर में उन्हें भाजपा के सामने झुकना ही है। जहाज पर बैठे पंछी की तरह शिवसेना चाहे जितनी दूर उड़ान भर ले लेकिन आखिर उसको भाजपा के जहाज पर ही आकर बैठना है।

इसके अलावा अदित्य ठाकरे जैसे नौसिखिये को मुख्यमंत्री बनाने का कोई तुक भी नही है। नाम के आगे ‘ठाकरे’ लगा होने के अलावा कोई काबिलियत उनमें नज़र नही आती है।आदित्य पर आज तक कि अंजना ओम कश्यप की “शिवसेना का राहुल गांधी” वाली टिप्पणी 100 फीसदी सही प्रतीत होती है। इसलिए हो सकता है महाराष्ट्र में शिवसेना अभी थोड़े नखरे और करे, समर्थन देने में आनाकानी भी करे, लेकिन जल्द ही देवेंद्र फडणवीस महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हुए और पीछे खड़े उध्दव ठाकरे तालियां बजाते हुए दिखाई दें ।

Talented View : जोड़-तोड़ की कुर्सी

– सचिन पौराणिक
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