Talented View : महागठबंधन की विडंबना…

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यूपी में महागठबंधन इसलिए बना था कि कैसे भी करके मोदी को रोकना है। चूंकि यदि सपा-बसपा अलग-अलग चुनाव लड़ते तो मोदी विरोधी वोट बंट जाता और इसका फायदा भाजपा उठा लेती क्योंकि चतुष्कोणीय मुकाबले में 2-3 फीसदी मतों का अंतर  हार-जीत तय करने में निर्णायक हो जाता है, लेकिन इस महागठबंधन में कांग्रेस शामिल नहीं है। कई सीटों पर कांग्रेस उम्मीद्वार महागठबंधन के वोट काट रहे हैं जबकि कई सीटों पर महागठबंधन भी कांग्रेस के वोट काट रहा है। यही इस महागठबंधन की विडंबना है।

Talented View : और जनता भी मोदी-मोदी चिल्लाने में व्यस्त

कल बनारस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अपना साझा उम्मीद्वार बदलते हुए सपा ने तेजबहादुर यादव को टिकट दे दिया। तेजबहादुर कुछ साल पहले सेना के जवान थे, जिन्होंने खराब खाने की शिकायत वीडियो बनाकर की थी। बीएसएफ ने तेजबहादुर को अनुशासन तोड़ने और संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त होने के कारण बर्खास्त कर दिया था। इस जवान ने सेना को मिलने वाले खाने का वीडियो बनाकर देश में काफी सुर्खियां बटोरी थी। सेना के शौर्य को चुनावी मुद्दा बनाने वाली भाजपा के खिलाफ सेना के ही सैनिक को उतारने का फैसला बुद्धिमानी भरा लगता है| इस फैसले को लेने में इतनी देर क्यों की गई, यह समझ से बाहर है।

हालांकि यह बात सभी जानते हैं कि नरेंद्र मोदी बनारस में ‘अपराजेय’ हैं, लेकिन कम से कम उन्हें कड़ी टक्कर तो दी ही जा सकती है। इस मामले में केज़रीवाल की तारीफ करनी पड़ेगी कि वे विपक्ष के सबसे बड़े नेता से सीधी टक्कर लेते हैं। 2014 की ‘मोदी लहर’ के बीच  वे काशी से मैदान में कूद पड़े तो दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी वे सीधे शीला दीक्षित के सामने ही चुनाव लड़े। उनकी इस नेतृत्व शक्ति से कार्यकर्ताओं में जोश आ गया और उन्होंने दिल्ली जीतकर इतिहास रच दिया। ऐसे ही बनारस में प्रियंका वाड्रा भी मोदी के खिलाफ चुनाव लड़कर कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जोश भर सकती थीं, लेकिन उन्होंने अपने कदम पीछे खींच लिए।

Talented View : कांग्रेस ने उम्मीदों से उलट फिर अजय राय को मैदान में उतारा

बनारस में तेजबहादुर की लड़ाई को मुश्किल बनाने के लिए अखिलेश के चाचा शिवपाल ने बिसात बिछा दी है। बाहुबली अतीक अहमद भी बनारस से निर्दलीय चुनाव लड़ने जा रहे हैं। अतीक अहमद शिवपाल के करीबी हैं और यहां के मुस्लिम वोटरों में उनकी अच्छी पकड़ है। बनारस में इस बार फिर मुकाबला चतुष्कोणीय हो गया है। भाजपा से प्रधानमंत्री मोदी, कांग्रेस से अजय राय, महागठबंधन से तेजबहादुर यादव तो निर्दलीय अतीक अहमद बनारस से ताल ठोकने उतर रहे हैं।

चार मजबूत उम्मीद्वारों के चुनावी मैदान में उतरने से मोदी की जीत का अंतर बढ़ना भी तय माना जा रहा है। विपक्ष की ऐसी लाचारी देखकर कहने को दिल करता है कि उन्हें मोदी को हराने के सब्ज़बाग देखना बंद कर देना चाहिए। एक संसदीय सीट पर भी यदि सब मिलकर एकजुट नहीं हो पा रहे हैं तो क्या सोचा जा सकता है कि ये स्वार्थी लोग दिल्ली में सरकार बना लेंगे? इनके आपस में झगड़े तो सुलझ नहीं पा रहे और ये लोग मोदी को रोकने का ख्वाब देख रहे हैं? पूरे हिंदुस्तान में एक सीट ऐसी नहीं है, जहां भाजपा के किसी मजबूत उम्मीद्वार को घेरने के लिए विपक्ष एकजुट हुआ हो।

भाजपा ने राहुल गांधी को अमेठी, ममता दीदी को बंगाल, अखिलेश को आजमगढ़, शत्रुघ्न सिन्हा को पटना, दिग्विजयसिंह को भोपाल, ज्योतिरादित्य को गुना में घेरने के लिए अपने मजबूत उम्मीद्वार मैदान में उतार रखे हैं। समझ नहीं आता कि ये विपक्षी दल आखिर भाजपा पर इतने मेहरबान क्यों हैं? भाजपा इतनी ताकतवर हो गई है कि दूसरे नेताओं को संसद पहुंचने नहीं दे रही है तो दूसरे दल इतने कमजोर हैं कि भाजपा के आगे दिखना भी नहीं चाहते।

Talented View : राजनीति के इस हमाम में सभी नंगे…

ऐसी हालत में यदि कांग्रेस कार्यकर्ता उदासीन हैं तो इसमें गलती किसकी है? बड़े नेता ही यदि चुनाव लड़ने में पीछे हट रहे हैं तो पार्टी कार्यकर्ता भी क्यों चुनाव में अपनी जान लगाएगा ? कांग्रेस जहां नेतृत्व की कमजोरी के कारण बनारस में चुनाव से बाहर है तो यहां चाचा शिवपाल ने ही अखिलेश के उम्मीद्वार की हवा निकाल दी है। अंदरूनी कलह से जूझ रही ये पार्टियां मोदी की राह आसान करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं।

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