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Talented View : भोपाल सीट से इस बार मुकाबला रोचक

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हर पार्टी में कुछ ऐसे चेहरे होते हैं, जिनसे आलाकमान त्रस्त रहता है, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई भी नहीं कर पाता है। ऐसे नेता हर पार्टी में हैं, जो गाहे-बगाहे अपने बयानों और कार्यों द्वारा पार्टी की मिट्टी पलीत करते रहते हैं। इनके बयान पार्टी के लिए न उगलते बनते हैं न निगलते। इनके बयानों को पार्टी द्वारा निजी राय बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की जाती है। ऐसे नेताओं पर चुनाव के समय विशेष नज़र रखनी पड़ती है क्योंकि इस समय इनके उल-जुलूल बयान पार्टी को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचा सकते हैं।  ये नेता पार्टी में रहकर दुश्मन के स्लीपर सेल की तरह कार्य करते हैं इसलिए पार्टियां भी इन्हें निपटाने की फिराक में लगी रहती हैं।

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भाजपा (BJP) के शत्रुघ्न सिन्हा (Shatrughan Sinha), कांग्रेस (Congress) के दिग्विजयसिंह (Digvijaya Singh) और मणिशंकर अय्यर (Mani Shankar Aiyar) जैसे नेता कुछ उदाहरण है। किसी एक खानदान या नेता वाली पार्टियों में ऐसे नेता तत्काल बाहर निकाल दिए जाते हैं, लेकिन जिन पार्टियों में थोड़ा लोकतंत्र बचा होता है, उनमें ऐसे मामलों पर जल्दी निर्णय नहीं लिए जाते हैं। मसलन, बसपा में बहन मायावती, शिवसेना में ठाकरे परिवार, समाजवादी पार्टी में अखिलेश, एआईएमआईएम में औवेसी बंधुओं और एनसीपी में शरद पवार जैसे नेताओं की पार्टियों में कोई आंतरिक लोकतंत्र नहीं पाया जाता है। जो शीर्ष नेता बोल दे वही पार्टी का संविधान बन जाता है इसलिए ऐसे नेता इन पार्टियों में नहीं पनप पाते हैं।

बहरहाल, मुद्दा यह है कि पार्टियां भी ऐसे नेताओं को ठिकाने लगाने में लगी रहती हैं। ऐसा ही एक मामला सामने आया है मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh News) के भोपाल में। यहां से कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह को लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election 2019) का उम्मीद्वार बनाकर एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है। दिग्विजयसिंह के बयान अक्सर पार्टी के लिए मुसीबत बन जाते हैं। लोकसभा चुनाव में दिग्विजयसिंह को खुला छोड़ना पार्टी को मंजूर नहीं था इसलिए उन्हें भोपाल (Bhopal) से चुनाव लड़वा दिया गया है। भोपाल भाजपा के लिए आसान सीट है और कांग्रेस के लिए मुश्किल इसलिए दिग्गी राजा को यहां से उतारने में पार्टी का हर हाल में भला ही होने वाला है। खुद चुनाव लड़ने से दिग्गी भोपाल में ही व्यस्त रहेंगे, जिससे बाकी देश में उनकी ज्यादा दखलंदाजी नहीं होगी।

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दूसरा फायदा यह है कि दिग्गी चुनाव हार गए तो पार्टी में उनका कद स्वतः कम हो जाएगा। तीसरा, यदि वे जीत गए तो कांग्रेस की लोकसभा में ताकत बढ़ेगी, लेकिन तीसरे विकल्प की उम्मीद कम ही है। अंदर ही अंदर पार्टी में यह चर्चा है कि दिग्गी राजा के प्रदेश की राजनीति में दखल से दु:खी होकर कमलनाथ और सिंधिया ने मिलकर ही उन्हें भोपाल से चुनाव लड़वाया है। पार्टी की यह चाल कामयाब भी होती दिखाई दे रही है। दिग्गी अपना पूरा समय आजकल चुनाव प्रचार में ही लगा रहे हैं। प्रदेश की राजनीति में उनका दखल भी कम होने लगा है। दिग्गी के लिए यह चुनाव इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि उनके खिलाफ भितरघात भी हो सकता है। दिग्गी का कद कम करने के लिए कई कांग्रेसी जी-जान से लगे हैं।

एक समय राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के ‘राजनीतिक गुरु’ माने जाने वाले दिग्गी राजा इस वक्त मुश्किल घड़ी से गुज़र रहे हैं। दिग्गी राजा के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए भाजपा भी दिग्गी जैसे ही किसी नेता को ढूंढ रही है, जिसे वे प्रदेश की राजनीति से दूर करके केन्द्र में भेज सके इसलिए उनके खिलाफ भी एक पूर्व मुख्यमंत्री यानी शिवराजसिंह चौहान को उतारने की तैयारी चल रही है। भाजपा का आलाकमान ‘मामाजी’  को केंद्र की राजनीति में लाना चाहता है, लेकिन मामाजी का मध्यप्रदेश से मोह छूट नहीं रहा है। ऐसे में दिग्गी के खिलाफ यदि मामा (Shivraj Singh Chouhan) को चुनाव लड़वाया जाता है तो समझ लेना चाहिए कि पार्टियां इन दोनों नेताओं से छुटकारा पाना चाह रही हैं। भोपाल सीट से इस बार मुकाबला रोचक रहने वाला है।

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