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शराब है ख़राब – भाग 1 : किस काम का ऐसा रेवेन्यू?

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चाकू अच्छा होता है या बुरा ?  जवाब है यदि सब्जी काटने जैसे काम में उपयोग किया जाए तो अच्छा होता है और किसी की गर्दन पर चला दिया जाए तो बुरा। स्वयं में चाकू न अच्छा है न बुरा। उपयोग करने वाले के विवेक और मंशा पर ही सबकुछ निर्भर करता है। ऐसे ही बंदूक भी होती है। आत्मऱक्षार्थ उपयोग में ली जाए तो अच्छी और किसी को मारने के काम में ली जाए तो बुरी। ऐसे ही दवाइयां भी होती है। नींद न आने वालों के लिए नींद की गोलियां संजीवनी से कम नहीं,  लेकिन ज्यादा मात्रा में किसी को ये देने से जान भी जा सकती है।

ऐसे ही शराब भी होती है। अपने आप में न अच्छी, न बुरी। इसका सेवन करने वाले की प्रवृत्ति पर ही सबकुछ निर्भर करता है। एक हिन्दी गाना भी है – “नशा शराब में होता तो नाचती बोतल..” सियाचिन जैसे दुर्गम स्थानों पर देश की रक्षा करने वाले जवानों को नियमित रूप से शराब मिलती है। बेहद उच्च क्वालिटी की शराब इन जवानों को उपलब्ध करवाई जाती है, जिससे वे दुर्गम परिस्थितियों में जीवित रह सकें। आर्मी की कैंटीन में भी कम दामों पर शराब मुहैया करवाई जाती है। आर्मी के मित्रों को कई शराबी कैंटीन से शराब मंगाने की गुहार लगाते दिख जाते है।

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खैर, शराब पर इतनी बातें इसलिए याद आ गईं क्योंकि आज शराब से जुड़ी एक खबर ने बरबस ही ध्यान आकर्षित कर लिया। मध्यप्रदेश में अब से शराब की बोतलों पर नई तरह की चेतावनी लिखी जाएंगी। अब से मध्यप्रदेश में हर शराब की बोतल पर लिखा जाएगा कि ये स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। इसके अलावा शराब पीकर वाहन न चलाने की चेतावनी भी बोतल पर लिखी जाएगी। इस काम के लिए 1 अप्रैल 2019 तक का समय दिया गया है। इससे पहले सभी बोतलों पर यह नई चेतावनी लिख दी जाएगी।

सरकार सोचती है कि चेतावनी लिखी होने से लोग शायद इसे पीना कम कर देंगे, लेकिन ऐसा वाकई में होगा, ये कहना बहुत मुश्किल नहीं है। ऐसे ही एक बार सरकारें जागी थी और सिगरेट के पैकेट पर धूम्रपान से कैंसर होने की चेतावनी लिखवाई गई थी। इसके अलावा मुंह के कैंसर का एक वीभत्स फोटो भी सिगरेट, गुटखा, तम्बाखू के पैकेट पर लगवाया गया था, लेकिन इस मुहिम से इन पदार्थों के सेवन में कोई कमी नहीं देखी गई। अब यही शराब के साथ होगा।

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शराब से लिवर खराब होता है, यह बात बच्चा-बच्चा समझता है। ये चेतावनी बड़े अक्षरों में लिखने से यदि कोई सोचता है कि लोग शराब पीना बंद कर देंगे तो इसे नादानी के सिवाय क्या समझा जाए?  हमारी सरकारों की परेशानी दरअसल यह है कि इन्हें रेवेन्यू भी कमाना है और जनहितैषी दिखना भी है। सरकार यदि सच में ही नहीं चाहती कि जनता शराब न पीएं क्योंकि यह स्वास्थ्य के लिए अच्छी नहीं  है तो क्यों नहीं इस पर प्रतिबंध लगा देती है?

गुजरात और बिहार के उदाहरण देश के सामने हैं, जहां शराबबंदी लागू है, लेकिन सरकार की मंशा ऐसी कतई नहीं है। सरकार चाहती है कि लोग खूब शराब पीएं, जिससे वे पैसा कमाएं। हक़ीक़त सरकार भी अच्छे से जानती है कि इस चेतावनी से कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला है। जिसे शराब पीना है, वह पीएगा ही चाहे बोतल पर कुछ भी लिखा हो, लेकिन सरकार की समस्या यह है कि उसे नैतिकता और रेवेन्यू की दो नावों पर एक साथ सवारी करना पड़ती है।

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दो नावों की सवारी करना वैसे ही टेढ़ी खीर होती है। सरकार यह तय ही नहीं कर पाती है कि उन्हें नैतिकता का रखवाला बनना है या व्यापारी की तरह पैसा कमाना है? शराब, सिगरेट से सरकार जितना ज्यादा पैसा कमाती है, उससे कई गुना ज्यादा पैसा कैंसर और स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च करना पड़ जाता है। किस काम का है ऐसा रेवेन्यू ?

क्रमशः

-सचिन पौराणिक

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