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Talented View : तो हम किस मुंह से कहेंगे “अतिथि देवो भवः”

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टूरिज्म अर्थात पर्यटन एक ऐसा क्षेत्र है, जो किसी देश की अर्थव्यवस्था को एक नए आयाम पर पहुंचा सकता है। पर्यटन एक ऐसी इंडस्ट्री है, जिसमें सभी के लिए कमाने का ‘स्कोप’ होता है। दुनिया में फ्रांस, अमेरिका, चीन, इटली, तुर्की, स्पेन जैसे देशों में सबसे ज्यादा पर्यटक हर साल पहुंचते हैं। इसके अलावा दुबई, मालदीव, थाइलैंड जैसे छोटे देश भी बड़े पैमाने पर पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।

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इन देशों की तुलना में प्राकृतिक सुंदरता या फिर पर्यटन स्थलों की कोई कमी भारत में नहीं है, लेकिन फिर भी पर्यटन के मामले में हम फिसड्डी ही साबित होते हैं। हमारे देश में पर्यटकों के ज्यादा न आ पाने की सबसे बड़ी वजह लोगों का नज़रिया और सुविधाओं का अभाव है। हमारे यहां विदेशी पर्यटक देखते ही उसे लूटने की होड़ मच जाती है। कितने ही ऐसे भी मामले सामने आ चुके हैं, जब किसी विदेशी सैलानी के साथ बलात्कार जैसी घृणित वारदात भी अंजाम दे दी जाती है। इसके अलावा हमारी ऐसी कई ऐतिहासिक और प्राकृतिक धरोहरें हैं, जो देखरेख के अभाव में उपेक्षा का शिकार बनी हुई हैं। अभी बारिश के मौसम में हर शहर के आसपास कुछ झरने चल पड़ते हैं, लेकिन नाममात्र की सुविधाएं वहां नहीं पहुंच पाती हैं।

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खैर, यह पर्यटन की कहानी आज इसलिए चल पड़ी है क्योंकि एक बड़ी खबर उत्तराखंड के ऋषिकेश से आ रही है, जहां विश्वप्रसिद्ध ‘लक्ष्मण झूले’ को बंद कर दिया गया है। लक्ष्मण झूला एक ऐसा टूरिस्ट पॉइंट है, जहां हरिद्वार या ऋषिकेश पहुंचने वाला हर सैलानी और श्रद्धालु ज़रूर पहुंचता है। यह झूला हवा के साथ थोड़ा हिलता रहता है, जिससे इस पर चलने में एक रोमांच पैदा होता है। झूले के तारों पर गंगा की लहरों के बीच कलाबाजियां दिखाते बंदर भी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं, लेकिन जितना सुंदर वर्णन इस झूले का है, उतना आनंद वहां खड़े होने पर प्राप्त नहीं हो पाता है। इसकी वजह है लोकल प्रशासन की लापरवाही।

देश-विदेश से लोग लक्ष्मण झूले पर कुछ पल खड़े होकर गंगा को निहारने और तस्वीरें खिंचाने के लिए पहुंचते हैं, लेकिन इस झूले को वहां के नागरिकों ने आम आवागमन का रास्ता बना दिया है। हर सेकंड झूले पर दोनों तरफ से दोपहिया वाहनों की आवाजाही लगी रहती है। पर्यटकों को इससे असुविधा होती है और झूले पर भी अनावश्यक वजन पड़ता है। इसके अलावा लगातार आवाजाही से पर्यटकों को भी यहां पहुंचकर निराशा ही हाथ लगती है।  यदि हम पर्यटकों की भावनाओं का ही सम्मान नहीं करेंगे, उनकी सुविधाओं का ख्याल नहीं रखेंगे तो फिर टूरिज़्म आखिर बढ़ेगा कैसे?

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“लक्ष्मण झूले” जैसे बेहतरीन पुल को भी हम आम रास्ते की तरह इस्तेमाल करेंगे तो ये दिन भी हमें देखना ही था। विशेषज्ञों के मुताबिक, लक्ष्मण झूला अब और भार नहीं वहन कर सकता है । इसके ज्यादातर हिस्से जर्जर हो चुके हैं। 1923 में बने इस पुल की छवि भारत के करोड़ों जनमानस के अंतर्मन में बसी हुई है। इतने दशकों में लक्ष्मण झूला एक प्रकार से ऋषिकेश की पहचान बन चुका है। अब इसके बंद होने की ख़बर से एक मायूसी सबके मन पर छा गयी है। लेकिन ये एक संकेत भी है कि हमें अपनी धरोहरों की फिक्र करना होगी, उनका रखरखाव करना होगा। दोबारा लक्ष्मण झूला शुरू होता है तो इस पर दोपहिया वाहनों की आवाजाही पर तत्काल रोक लगनी चाहिए। ऐसे कितने ही “लक्ष्मण झूले” देशभर में है, जिन्हें सहेजने की ज़रूरत है।

अगर हम यह कर पाते हैं और पर्यटकों के प्रति हमारा नज़रिया बदल पाते हैं तो यकीनन कुछ सालों में भारत भी विश्व पर्यटन के मानचित्र पर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करवा सकता है। और हमें ये बदलाव लाना ही होगा नहीं तो हम किस मुंह से कहेंगे कि “अतिथि देवो भवः” ?

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