Talented View : दुष्कर्मी को शैतान समझकर सज़ा सुनाई जाए

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देश के बहुचर्चित “कठुआ रेप केस’ ( Kathua Rape Case) में आखिरकार दोषियों की सज़ा का ऐलान कर ही दिया गया। पठानकोट की विशेष अदालत ने तीन दोषियों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई वहीं तीन पुलिस वालों को भी 5-5 साल की सज़ा सुनाई गई है। यह केस इसलिए चर्चा में आ गया था क्योंकि सेक्युलर, लिबरल और बॉलीवुड वाले गैंग ने इस केस में बहुत हंगामा मचाया था। इस केस के बाद देश को एक बार फिर “असहिष्णु” बताने की होड़ मच गई थी, लेकिन हमारा कहना तब भी यही था कि किसी भी दुष्कर्मी और दुष्कर्म पीड़िता का विरोध या समर्थन कम से कम धर्म या मज़हब देखकर तय नहीं किया जाना चाहिए।

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रेप के आरोपी को धर्म या मज़हब के चश्मे से ऊपर सिर्फ एक शैतान समझकर सज़ा सुनाई जानी चाहिए क्योंकि देश में एक ऐसा गैंग सक्रिय है, जो अल्पसंख्यकों के मामलों पर बहुत शोर-शराबा करता है जबकि बाकी मामलों पर चुप्पी साध लेता है। ये गैंग न सिर्फ भारत की गंगा-ज़मनी संस्कृति को नष्ट कर रहा है बल्कि भारत की छवि पर भी धब्बे लगा रहा है।

कठुआ केस की पीड़िता ‘आसिफ़ा’ के लिए इंसाफ़ की आवाज़ बुलंद करने वाली ज्यादातर शख्सियतों ने अभी हालिया अलीगढ़ रेप पर अपना मुंह बंद रखना ही बेहतर समझा। जनता द्वारा कई दिनों तक सवाल पूछने के बाद इनमें से कुछ ने सोशल मीडिया पर सांकेतिक विरोध जता दिया। इस गैंग का दोहरा चरित्र देश की जनता देख रही है।

खैर, आज का विषय यही है कि इतने बहुचर्चित केस में भी अगर अपराधियों को फांसी की सज़ा नहीं दी जाएगी तो समाज में क्या संदेश जाएगा? क्यों नहीं कठुआ के दोषियों को फांसी की सज़ा सुनाई गई? क्यों इन शैतानों को मरते दम तक सांस लेने की छूट दी गई है? कठुआ, अलीगढ़, भोपाल या देश में कहीं भी किसी बच्ची को नोचा जाता है तो उन दरिंदों को फांसी क्यों नहीं दी जाती? ऐसे मामलों में हम ‘खाड़ी देशों’ से क्यों नहीं सीखते? वहां का कानून चाहे क्रूर लगे, लेकिन ये अपराधी भी कहां इंसान हैं ?

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मासूम बच्चियों में किसी आदमी को हवस नज़र आ जाए तो उस शैतान को चौराहे पर लटकाकर फांसी क्यों न दी जाए? अगर हमारी न्यायपालिका ऐसे मौकों पर भी फांसी की सज़ा सुनने से हिचक रही है तो क्या वे बच्चियों से और ज्यादा बर्बरता की उम्मीद करती है? बच्चियों से रेप के मामले तभी कम होंगे, जब अपराधियों के मन में सज़ा का खौफ पैदा होगा। और यह खौफ यूं ही पैदा नहीं हो जाएगा। इसके लिए पुलिस, वकीलों और जजों के मन में इन दरिंदों को लटकाने का जज़्बा जगाना होगा।

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हर पीड़िता को यदि सरकारी तंत्र अपनी बेटी समझकर कार्रवाई करेगा तो यकीनन इंसाफ बहुत जल्दी मिलेगा। और सेक्युलर गिरोह को भी अपनी आवाज़ सिर्फ “आसिफा” के लिए ही नहीं बल्कि “ट्विंकल” के लिए भी उतनी ही शिद्दत से उठानी चाहिए। जिस दिन हमने दुष्कर्मियों को उनके धर्म-मजहब से ऊपर उठकर केवल एक राक्षस समझकर देखना शुरू कर दिया, उस दिन से हालात सुधरने लग जाएंगे।

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