Talented View : राज करने की बाज़ार नीति मतलब राजनीति

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6 दिन तक लगातार चले सियासी उठापटक के बीच कर्नाटक के नाटक का आखिर पटाक्षेप हो गया। विधानसभा में विश्वास मत के दौरान कुमारस्वामी सरकार अपना बहुमत साबित नही कर सकी। सरकार के पक्ष में 99 और विपक्ष में 105 वोट गिरे। इस तरह कुमारस्वामी और कांग्रेस की अपने किले को बचाने की सारी कोशिशें नाकाफी सिद्ध हुई। येदियुरप्पा ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि कर्नाटक के असली किंग वो ही है। अब चर्चा इस पर हो रही है कि कर्नाटक में जो हुआ वो सही है या गलत? इस बात का जवाब सीधा नही हो सकता।

Talented View : ट्रम्प के अच्छे दिन जल्द ही जाने वाले हैं

सैद्धांतिक तौर पर सोचा जाए तो सबसे ज्यादा सीटें जीतकर भाजपा का विपक्ष में बैठना भी सही नही था।दो विरोधी दलों का चुनाव के बाद गठबंधन करके सरकार बनाना भी सही नही था और इस तरह की खरीद-फरोख्त में बाद सरकार बनाना भी सही नही है। मौजुदा हालातों में लड़ाई सही बनाम गलत की हो भी नही सकती। अब लड़ाई सिर्फ ‘सरासर गलत’ बनाम ‘थोड़ा गलत’ के बीच है। ये सच है कि इस तरह जनता की चुनी हुई सरकारों को गिरा देना सही नही है, लेकिन थोड़ा पीछे लौटकर देखें तो किस पार्टी ने सबसे ज्यादा जनता की सरकारों को गिराया है? ये परंपरा शुरू किसने की है? विधायकों की जोड़तोड़ की बजाय सीधे केंद्र के हस्तक्षेप से सरकारें क्या आज तक नही गिराई गयी है? ऐसा थोड़ी हो सकता है कि आप सरकार को गिराएं तो “लोकतंत्र की रक्षा” और दूसरा गिराए तो “लोकतंत्र खतरे में।”

 

Talented View : जनता पर बोझ लादना बंद करो, हैप्पीनेस इंडेक्स बढ़ेगा

शुचिता, ईमानदारी के पैमानें सभी के लिए समान नही होने चाहिये? अब इसे सही कहें या गलत लेकिन कर्नाटक के बाद अब सबकी निगाहें मध्यप्रदेश और राजस्थान पर जा टिकी है। कमलनाथ सरकार अल्पमत में है तो अशोक गहलोत के पास भी पूर्ण बहुमत नही है। ऐसे में महज कुछ विधायकों के “हृदय परिवर्तन” से कमलनाथ की कुर्सी जा सकती है। क्योंकि विधायकों के हृदय परिवर्तन कराने की कला में भाजपा पारंगत हो चुकी है। गोआ और मेघालय इस ‘कला’ के साक्षात उदाहरण है। अगर सबकुछ ठीक रहता है तो कर्नाटक के उदाहरण भी इसमें जुड़ जायेगा। कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस सरकार बहुमत खो चुकी है ये तभी स्पष्ट हो गया था जब विश्वासमत के लिए बेवजह की देरी की जा रही थी। दोनों दलों ने इन छह दिनों में विधायकों को वापस बुलाने की हरसंभव कोशिश की। लेकिन इधर येदियुरप्पा ने भी ऐसा चक्रव्यूह रच रखा था कि कुमारस्वामी के पास इससे बाहर आने का कोई रास्ता नही बचा था। बाकी लोकतंत्र, संविधान बचाने जैसी बातें बिल्कुल फ़िज़ूल है।

जनता जानती है किस मुद्दे के समाधान के लिए किसके पास जाना है

ये ट्रेंड बन चुका है कि सत्ता पक्ष सरकार चलाता है और विपक्ष में बैठे नेता आजकल लोकतंत्र बचाने में लगे रहतें है। ये कहने में जरा भी गुरेज़ नही है कि मध्यप्रदेश के विधायकों का हृदय परिवर्तन भी आने वाले दिनों में जल्द ही देखने को मिलेगा। धनबल और बाहुबल द्वारा सत्ता हथियायी जाएगी और विपक्ष फिर से “लोकतंत्र खतरे में है” की दुहाई देता नज़र आएगा। किन्तु जनता भी समझ चुकी की खतरे में असल मे लोकतंत्र या संविधान नही बल्कि सिर्फ सत्ता है। एक पक्ष से सत्ता छिनेगी तो दूसरे को मिलेगी। ईसलिये विपक्ष वालो का ये राग आगे भी जारी रहने वाला है

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