Talented View : शुचितापूर्ण राजनीति को अब भूल जाएं

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भारत की राजनीति में अटलजी को नैतिकता, शुचिता और ईमानदारी का पर्याय माना जाता है। परिस्थितियां कैसी भी रही, उन्होंने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। केंद्र में छोटे-बड़े दलों को जोड़कर 6 साल सरकार चलाने जैसे जोखिम भरे काम के बाद भी उन पर कोई दाग न लगना किसी चमत्कार से कम नहीं, लेकिन उनके इन मूल्यों से उन्हें हासिल क्या हुआ? सभी दलों के नेताओं और जनता का सम्मान बस ? उनके जैसी ईमानदार शख्सियत की सरकार को भी लोकसभा में सिर्फ़ एक वोट से नहीं गिरा दिया गया? देश ने भी उन्हें दोबारा मौका दिया क्या ? अच्छे नेताओं के साथ ऐसा सलूक होते देखकर उस समय राजनीति की युवा पीढ़ी ने क्या सोचा होगा? कैसे सबक लिए होंगे? इसी का नज़ारा आजकल देशभर में देखने को मिल रहा है।

इसका ताज़ा उदाहरण कर्नाटक से सामने आ रहा है। विधानसभा में सबसे बड़े दल भाजपा को कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन के कारण सत्ता से बाहर होना पड़ा, लेकिन इसके साइड इफेक्ट्स अब देखने को मिल रहे है। पिछले कुछ दिनों से कर्नाटक का सियासी पारा बढ़ता ही जा रहा है। दो निर्दलीय विधायकों के सरकार से समर्थन वापसी की खबरों के बीच भाजपा के एक विधायक ने अगले 48 घंटों में राज्य में भाजपा की सरकार बनाने का दावा कर दिया।

कांग्रेस के समर्थन से सरकार चला रहे मुख्यमंत्री कुमारस्वामी हालांकि सरकार को कोई खतरा नहीं बता रहे हैं, लेकिन उनकी खुद की स्थिति सही नहीं है। गठबंधन की सरकार चलाने के लिए वे सिर्फ नाम के मुख्यमंत्री हैं क्योंकि उन्हें काम करने के लिए ‘फ्री-हैंड’ कभी नहीं मिल पाया है। ऊपर से भाजपा जैसा विपक्ष उन्हें बिल्कुल चैन से नहीं बैठने देता है। येदियुरप्पा के नेतृत्व में विपक्ष उनके विधायकों पर हमेशा आंखें गड़ाए बैठे है। इन सबके बीच पिछले 2 दिनों में राज्य में हलचल और बढ़ गई है। अटल बिहारी प्रकरण से भाजपा की नई पीढ़ी ने यह सबक सीख लिया है कि नैतिकता, शुचिता आदि ढकोसलों से कोई भला नहीं होता।

इन सबसे न सरकार बनती है, न जनता खुश होती है। भाजपा नेता इसलिए अब साम-दाम-दंड-भेद कैसे भी करके सरकार बनाने में यकीन करने लगे हैं। भाजपा को इनसे फायदा भी देखने को मिल रहा है और विपक्ष में हाहाकार मचा है। कर्नाटक में भाजपा सरकार बनाने के प्रयासों में जुट गई है और मध्यप्रदेश भी उनके निशाने पर है। नई भाजपा को सियासी जोड़तोड़ से कोई परहेज नहीं है। राजनीति में सब जायज़ है क्योंकि शुचिता, नैतिकता वाले नेता यहां टिक भी नहीं पाते हैं।

आज के दौर में जब किसी पार्टी में ये गुण नहीं बचे हैं तो किसी विशेष दल से इन गुणों की उम्मीद करना भी बेमानी ही है। अटलजी ने जो किया सो किया, लेकिन नई भाजपा ऐसा कुछ नहीं करने वाली। सत्ता पाने के लिए हरसंभव प्रयास अब भाजपा करती है। इसमें कुछ गलत भी नहीं है क्योंकि इस हमाम में सभी नंगे हैं। राजनीति में शुचिता या फिर शुचितापूर्ण राजनीति को अब भूल जाना चाहिए।

-सचिन पौराणिक

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