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Talented View : देश की दुश्मन दोहरी मानसिकता

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सलमान रुश्दी भारतीय मूल के ख्यात उपन्यासकार है। उनकी किताब ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रन’ बेहद चर्चित रही और इसे ‘बुकर अवार्ड’ भी मिला। इसके बाद उन्होंने एक किताब लिखी ‘सैटेनिक वर्सेस’ जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवादों का सामना करना पड़ा। मुस्लिमो ने इस किताब को अपने नबी की शान में गुस्ताखी बताते हुए रुश्दी को जान से मारने के फतवे निकालने शुरू किए।

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सलमान रुश्दी को अपनी जान बचाने के लिए कई साल भमिगत रहकर गुज़ारने पड़े। इस दौरान वो कभी-कभार ही सार्वजनिक मंचो पर नज़र आये। ईरान के कट्टरपंथी नेता अयातुल्ला खोमैनी ने रुश्दी को जान से मारने की धमकी दी थी जिसके चलते इंग्लैंड और ईरान के राजनयिक सम्बन्ध तक बिगड़ गए थे। लेकिन रुश्दी को करीब से जानने वाले बतलातें है कि रुश्दी का इरादा स्पष्ट था। उन्होंने ‘सैटेनिक वर्सेस’ सिर्फ प्रसिद्दि पाने के के उद्देश्य से ही लिखी थी। हालांकि मजहबी कट्टरपंथियों की वजह से आज भी ये किताब दुनिया के कई देशो में प्रतिबंधित है और रुश्दी आज भी सुरक्षा घेरे में ही रहने को मजबूर है।

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किताब में कही गयी बातें सही थी या गलत इस पर आज तक चर्चा नही हुई, चर्चा हुई तो बस रुश्दी का सर कलम करने को लेकर। दुनिया की सबसे बड़ी समस्या आज यही है। आतंकवाद के मूल में भी यही विचारधारा है। रूश्दी से लेकर कमलेश तिवारी तक सभी इस जिहादी सोच का ही शिकार हुए है। अगर किसी ने कोई गलत टिप्पणी किसी मजहब को लेकर कर भी दी तो उसके लिए कानून है, न्याय की एक व्यवस्था है। इस पर व्यापक चर्चा होना चाहिए, ये बात-बात पर जान से मारने के फतवे निकालने का भला क्या तुक है?

अगर इंसाफ का ये तरीका शरिया से लिया हुआ है तो फिर मुस्लिमों के सभी अपराधों का निर्णय भी शरिया द्वारा ही होना चाहिए। खुद पर बात आये तो भारत का संविधान और दूसरों का इंसाफ करना हो तो शरिया कानून, ऐसा दोगलापन आखिर क्यों? मजहबी कट्टरता का विरोध सभी को करना चाहिए। लेकिन दुखद है कि कमलेश तिवारी की हत्या का विरोध करने वालो में कोई अल्पसंख्यक नही है। बल्कि कई तो बेशर्मी से इसे सही भी ठहरा रहे है। ऐसा करके वो सिर्फ बहुसंख्यक वर्ग की दुर्भावना अर्जित कर रहे है जो भविष्य में काफी खतरनाक साबित हो सकती है।

अखलाक, पहलू खान और तबरेज़ की मौत पर रुदाली करने वाले कमलेश तिवारी पर खुश हो रहे है तो ये अच्छा संकेत नही है। ये आपके साथ ही आपकी विचारधारा को भी कटघरे में खड़ा करता है। अल्पसंख्यक इस देश मे जैन, बौद्ध, पारसी भी है। लेकिन वो देश और बहुसंख्यकों के खिलाफ नही बल्कि उनके साथ खड़े होतें है, देश की संस्कृति का सम्मान करतें है। ऐसा कोई वाक्या किसी को याद नही जब जैन, बौद्ध या पारसी धर्मावलंबियों द्वारा अपने धर्म पर गलत टिप्पणी करने पर किसी का गला काटा गया हो। ऐसी हिंसक मनोवृत्ति वर्गविशेष में ही क्यों पायी जाती है, इस पर भी चिंतन होना चाहिये।

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बात सलमान रुश्दी या कमलेश तिवारी की ही नही, बल्कि इंसानियत की है, समझदारी की है, विश्वशांति की है। जब तक ऐसी असहिष्णुता पर लगाम नही लगेगी तब तक देश मे अमन स्थापित नही हो सकता। कल कमलेश तिवारी के हत्यारों को गुजरात एटीएस ने पकड़ लिया है। पुलिस, प्रशासन और राज्य सरकार को इस हत्याकांड में शामिल हर शख्स को कठोरतम सज़ा दिलवाना चाहिये। इन अपराधियो को ऐसी सज़ा मिले, हत्यारो का वो अंजाम किया जाए जिससे भविष्य में कोई कानून हाथ मे लेने से पहले 100 बार सोचें। हमें दुनिया को रहने के लिए एक बेहतर जगह बनानी है तो कट्टरपंथियों से सख्ती से निपटना ही होगा।

– सचिन पौराणिक

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