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Talented View : कमज़ोर होने की कीमत चुका रही कांग्रेस

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‘पॉलिटिकल फंडिंग’ लोकतंत्र की ऐसी सच्चाई है, जिस पर पर्दा डालने की गाहे-बगाहे कोशिशें होती रहती हैं। सभी जानते हैं कि चुनाव में पैसों की नदियां बहाई जाती है। यह पैसा कहां से आता है और कहां खर्च होता है, इसका कोई हिसाब नहीं रखा जाता है। राजनीतिक पार्टियां बाकायदा अपने कई नेताओं को इस काम का दायित्व देकर रखती हैं। ये नेता पार्टी के लिए फंड इकठ्ठा करते हैं और जिस राज्य में पैसों की ज़रूरत होती है, वहां पहुंचाते हैं। ज्यादातर फंड कॉरपोरेट घरानों, बड़े कारोबारियों और उद्योगपतियों द्वारा दिया जाता है और कुछ फंड पार्टी कार्यकर्ता लोकल लेवल पर इकट्ठा करते हैं। इसके अलावा पार्टी फंड का बड़ा हिस्सा उन राज्यों से आता है, जहां पार्टी की सरकार होती है। यह पैसा अधिकारियों के तबादले करने, अवैध गतिविधि करने वालों से, खनन माफिया, सत्ता माफिया और अवैध शराब का रैकेट चलाने वालों से वसूला जाता है।

Talented View : कांग्रेस वालों की हालत हार का डर तो नहीं

अब सवाल है कि कोई राजनीतिक पार्टियों को पैसा आखिर क्यों देगा? इसका सीधा जवाब यह है कि पार्टी पैसा लेकर उसका कुछ अहसान भी चुकाती है। पैसा देने वालों के गोरखधंधों पर सरकार आंखें मूंदकर रखती है। इसके अतिरिक्त ये लोग सरकार की ‘गुड लिस्ट’ भी में आ जाते हैं। कोई भी सरकारी अधिकारी इन लोगों पर हाथ डालने में घबराता है।

Talented View : उम्मीद पर ही दुनिया कायम है..!

यह भी एक तथ्य है कि जिस पार्टी के पास जितनी ज्यादा मात्रा में चुनावी पैसा होता है, उस पार्टी के चुनाव जीतने की संभावनाएं भी उतनी बढ़ जाती है। “माल है तो ताल है” वाली कहावत इस परिदृश्य में बिल्कुल फिट बैठती है।

अब बात करते हैं देश के वर्तमान राजनीतिक हालातों की। 2014 के बाद से देश का राजनीतिक चित्र बहुत तेज़ी से बदला। कांग्रेस राज्य दर राज्य हारती चली गयी। भाजपा ने मोदी की आंधी में त्रिपुरा, गोवा जैसे राज्यों में भी सरकार बना ली, जहां ऎसा किसी ने सोचा भी नहीं था। कांग्रेस लगभग विलुप्त होने के कगार पर आ गई थी। इसका साइड इफेक्ट यह हुआ कि कांग्रेस आर्थिक तौर पर बदहाल हो गई।

इधर, केंद्र और राज्य दोनों जगह भाजपा होने से भाजपा की माली हालत बहुत बेहतर हो गई। जैसे रेगिस्तान में भटकते मुसाफिर को पानी मिल जाए, उसी तरह अचानक से कांग्रेस को मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सरकार बनाने का मौका मिल गया। तीनों राज्यों में सरकार बनते ही पार्टी को अपनी माली हालत सुधारने का मौका मिल गया।

इधर, लोकसभा चुनाव भी करीब है और ऐसे हालात में मुख्यमंत्री ने तबादलों की झड़ी लगा दी। तबादला उद्योग से उगाही गई रकम को चुनाव में लगाने की तैयारी थी, लेकिन उन्हें खबर नहीं थी कि उन पर केंद्रीय एजेंसियां नज़र रखे हुए हैं। जब यह पैसा दिल्ली पहुंचाने की तैयारी चल रही थी, तभी इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने मुख्यमंत्री कमलनाथ के करीबियों पर शिकंजा कस लिया। कमलनाथ को इस कार्रवाई की भनक न लगे, इसके लिए इतिहास में पहली बार सीआरपीएफ को लेकर इनकम टैक्स डिपार्टमेंट छापा मारने पहुंचा। आधी रात को शुरू हुई ये कार्रवाई अगले 2 दिनों तक चली। कांग्रेस के बड़े नेताओं सहित कमलनाथ भी इस कार्रवाई से सकते में आ गए।

इस कार्रवाई में लगभग 250 करोड़ के बेहिसाबी लेन-देन का अनुमान लगाया जा रहा है। इस कार्रवाई के पीछे असली उद्देश्य यही है कि कांग्रेस पर दोहरा प्रहार किया जाए। पहला यह कि कमलनाथ सरकार की छवि खराब की जाए औए दूसरा यह कि कांग्रेस को आर्थिक तौर पर मजबूत न होने दिया जाए। चुनाव के लिए इस तरह की वसूली भाजपा, कांग्रेस, बसपा, सपा, द्रमुक, लोजपा, राजद, राकांपा आदि सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां करती हैं। मध्यप्रदेश में कुछ नया नहीं हुआ है। या यूं कहें कि नया सिर्फ यह हुआ है कि इस बार केंद्र सरकार हरगिज़ नहीं चाहती कि कांग्रेस की माली हालत बेहतर हो।

Talented View : भाजपा नेतृत्व को उन्हें उचित सम्मान देना चाहिए था

केंद्र और राज्यों में कमज़ोर होने की कीमत कांग्रेस पार्टी चुका रही है। कांग्रेस को इन सबसे सहानुभूति भी नहीं मिलने वाली क्योंकि उसके दामन पर इस तरह के दाग पहले से लगे हुए हैं। कांग्रेस जो हरकतें अपने विरोधियों के साथ किया करती थी, वैसा स्वाद उसे अब अब खुद चखना पड़ रहा है। केंद्र की वर्तमान सरकार “शठे शाठ्यम समाचरेत्” की नीति पर काम कर रही है।

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