बिल्ली के भाग्य से छींका फूटना

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अमूमन किसी राज्य के मुख्यमंत्री द्वारा पद की शपथ (Talented View On Kamal Nath Cabinet Minister) लेते समय उनके साथ कुछ मंत्री भी शपथ लेते हैं। बाद में विभागों का बंटवारा अवश्य किया जाता है, लेकिन कुछ नाम तो ऐसे होते ही है, जिनका मंत्री बनना तय होता है। जैसे राजस्थान में भाजपा जीतती है तो गुलाबचंद कटारिया, दिल्ली में कांग्रेस जीतती है तो अजय माकन, बिहार में भाजपा जीतती है तो सुशील मोदी, जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस जीते तो ग़ुलाम नबी आज़ाद जैसे कुछ नेता मुख्य नेतृत्व से इतर इतना दमखम रखते हैं की पार्टी की विजय के साथ ही इनका मंत्री पद भी पक्का हो जाता है।

आश्चर्य की बात है कि मध्यप्रदेश में नई सरकार बने और कमलनाथ को मुख्यमंत्री पद की शपथ लिए एक हफ्ते से ज्यादा समय गुज़र गया, लेकिन अब तक एक भी मंत्री (Talented View On Kamal Nath Cabinet Minister)) का नाम तय नहीं हो सका है।

मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते समय कमलनाथ के साथ किसी अन्य नेता ने कैबिनेट मंत्री की शपथ नहीं ली। मंत्रियों के नाम पर अब भी असमंजस बना हुआ है। कहा जा रहा है कि राहुल गांधी मंत्रिमंडल गठन पर अंतिम फैसला लेंगे और 25 दिसंबर को मंत्रियों को शपथ दिला देंगे, लेकिन मंत्रिमंडल गठन में इतना समय लगने से यह बात तय हो गई है कि कांग्रेस की आन्तरिक कलह थमने का नाम नहीं ले रही है। ऐसा नहीं होता तो ज्योतिरादित्य सिंधिया, तुलसी सिलावट, जीतू पटवारी जैसे नेता क्या मुख्यमंत्री के साथ शपथ नहीं ले सकते थे?

क्या मध्यप्रदेश में कांग्रेस के 5-10 नेता भी इतने मजबूत नहीं हैं, जो निर्विरोध मंत्री पद की शपथ ले सकें? अजय सिंह का अंतर्विरोध और मंत्री बनने की चाह क्या मंत्रिमंडल गठन की राह में बाधा बनी? या फिर कमलनाथ खेमे, सिंधिया खेमे और दिग्विजयसिंह खेमे की अपने ज्यादा से ज्यादा विधायकों को मंत्री बनाने की जोर-आजमाइश की वजह से विलंब हुआ या अंतर्कलह के कारण ही मंत्रियों के नाम तय नहीं हो पा रहे हैं? किसी राज्य में कोई पार्टी अपनी मेहनत, कार्यकर्ताओं के उत्साह और रणनीति के दम पर चुनाव जीतती है तो ऐसी नौबत कदापि नहीं आती, लेकिन यदि कहीं बिल्ली के भाग्य से छींका फूट जाए तो क्या किया जा सकता है?

कांग्रेस की मध्यप्रदेश में जीत दरअसल भाजपा की हार की एक प्रतिक्रिया मात्र है। जनता ने भाजपा को हराने के लिए वोट किया और इसके फलस्वरूप कांग्रेस जीत गई। जनता का कांग्रेस से कोई विशेष मोह नहीं बल्कि भाजपा के खिलाफ एक गुस्से की लहर थी, जिसकी वजह से कमलनाथ आज मुख्यमंत्री की कुर्सी तक आ पहुंचे हैं।

मंत्रिमंडल गठन में आलाकमान का हाथ और पार्टी नेताओं की आपसी माथापच्ची से उपरोक्त बातें सिद्ध हो रही हैं। मंत्री पद की रेवड़ी आखिर किस विधायक को नहीं चाहिए? यदि कांग्रेस नेताओं ने ज़मीनी स्तर पर काम किया होता तो अपनी मेहनत के दम पर मंत्री बनने की राह अब तक प्रशस्त हो गई होती।  सब जानते हैं की यहां तो गुटबाजी और आलाकमान की दखल से ही सब काम होने हैं इसलिए विधायक भी पूरी ताकत से ज़ोर लगा रहे हैं। मध्यप्रदेश की तस्वीरों को देखकर ऐसा लग रहा है की यहां बिल्ली के भाग से छींका फूट तो गया है, लेकिन सोचने की बात यह भी है कि ऐसा भाग्य हर बार कहां चलता है?

-सचिन पौराणिक

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