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Talented View : चंद लोगों के लालच की सज़ा पूरे प्रदेश को भुगतना पड़ेगी

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दिल्ली के मुख्यमंत्री ने मेट्रो को महिलाओं के लिए मुफ्त करने की घोषणा करके खलबली मचा दी। हालांकि सभी जानते हैं कि यह चुनावी स्टंट है, लेकिन तब भी अंदेशा यही है कि यह स्टंट भी काम कर सकता है। मुफ्त के माल के हम भारतीय इतने दीवाने होते हैं कि 5 लाख की कार के साथ यदि पांच हजार का मोबाइल ‘मुफ्त’ मिलता है तो हम रिश्तेदारों को मोबाइल पहले दिखाते हैं, कार बाद में।

राजनीति की बात करें तो इस मुफ्त के माल के ताज़ा शिकार मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की जनता बनी है। मध्यप्रदेश में किसानों के कर्जमाफी के मुद्दे पर चुनकर आई कमलनाथ सरकार अब तंगहाली के दौर से गुज़र रही है। किसानों ने कर्जमाफी के लालच में आकर कांग्रेस को जितवा तो दिया, लेकिन उनके हाथ में भी पछतावे के सिवाय कुछ आ नहीं रहा है क्योंकि चुनाव की तपिश में जनता यह समझ नहीं पाती कि तेल तो आखिर तिल्ली से ही निकलना है। सरकार कर्ज़ माफ कर भी देगी तो उसकी भरपाई भी जनता की जेब से ही होगी।

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राज्य में कर्जमाफी के बाद अब सरकार के पास प्रदेश चलाने के लिए भी पैसे नहीं बचे हैं इसलिये सूबे के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने 15 से लेकर 21 हजार करोड़ तक अतिरिक्त कर वसूलने का भारी-भरकम टारगेट कुछ विभागों को दे दिया है। वाणिज्य कर, आबकारी और परिवहन विभागों को इसकी सूचना दे दी गई है। अब ये विभाग इस अतिरिक्त कर वसूली के लिए उद्योगपतियों, पूंजीपतियों को परेशान करेंगे और खुद की जेबें भी गर्म करेंगे। इस कदम से एक तरह से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा और जनता पर ही बोझ पड़ेगा।

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इस परिस्थिति को ऐसे समझें । एक गांव में 100 मुर्गियां थीं, जो रोज़ 1-1 अंडा देती थीं। गांव की आबादी भी करीब इतनी ही थी, जिससे काम आराम से चल रहा था, लेकिन मुखिया ने चुनाव जीतने के लिए पास के गांव को 50 अंडे मुफ्त देने की घोषणा कर दी। अब गांव में अंडों की कमी हो गई। हालात संभालने के लिए मुखिया मुर्गी मालिकों को आदेश दे रहे हैं कि सारी मुर्गियों से कह दो कि कल से सबको 2-2 अंडे रोज़ देने पड़ेंगे। अब मुर्गियां सोच रही हैं कि मुखिया की सनक की कीमत हम क्यों भुगतें? हमें थोड़े ही चुनाव जीतना है। ऐसे ही हाल प्रदेश के हो गए हैं। किसी नेता के चुनाव जीतने की ‘सनक’ का खामियाजा अब अंडा देने वाली मुर्गियों को उठाना पड़ेगा।

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जो उद्योगपति पहले से भरपूर टैक्स भर रहे हैं अब सरकारी महकमे उन्हें परेशान करने में लग जाएंगे। उद्योगपति, पूंजीपति भी जेब से पैसा तो देंगे नहीं। वो नहीं कहीं न कहीं अपनी सेवाओं और उत्पादों का शुल्क बढ़ाएंगे, जिससे आखिरकार बोझ जनता पर ही बढ़ने वाला है। किसानों की कर्जमाफी के इस चक्रव्यूह में पूरे प्रदेश की जनता फंस चुकी है। ऐसी मुफ्तखोर जनता की किस्मत में ‘केज़रीवाल’ और ‘कमलनाथ’ जैसे नेता ही लिखे हैं। इन चंद लोगों के लालच की सज़ा पूरे प्रदेश को भुगतना पड़ती है।

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