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Talented View : जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान

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ईसाइयों ने अपने धर्म का प्रचार जोरशोर से किया। हर संभव तरीक़े से उन्होंने वंचितों, शोषितों, दबे-कुचलों का धर्म परिवर्तन किया। सुदूर वनवासी क्षेत्रों में कभी वो डिस्प्रिन की गोली के बदले बच्चे के गले में ‘क्रॉस’ पहना देतें है तो कभी भोले-भाले ग्रामीणों को बहला-फुसलाकर उनका धर्म बदल देतें है। ज्यादातर ईसाई संस्थाओं की सेवाभावना के पीछे असली मकसद धर्मांतरण ही होता है। सभी मिशनरियां ऐसी नही होती लेकिन अधिकतर का रिकॉर्ड खराब ही है।

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ईसाइयों के धर्म परिवर्तन को यहां निंदा के उद्देश्य से चिन्हित नही किया गया है बल्कि इसके पीछे उनके जज़्बे और मुक्त सोच को दर्शाने की कोशिश की गई है। अभी कुछ दिन पूर्व एक एक ऐसा ही ईसाई स्कॉलर अंडमान के प्रतिबंधित आदिवासी क्षेत्र में बाइबिल लेकर पहुंच गया था। हालांकि जनजाति कबिले ने उसे मार डाला लेकिन अपने धर्म के विस्तार के प्रति उसका जो जज़्बा था उसकी बात यहां की जा रही है।

अपने धर्म के विस्तार के प्रति इस जज़्बे का हिंदुओं में सदा ही अभाव रहा है। हमने मानवसेवा बाकियों से ज्यादा ही कि होगी लेकिन इसके बदले कभी किसी का धर्म बदलने की कोशिश नही की। प्राणीमात्र की सेवा का भाव ही सदा हमने मन में रखा। लेकिन कालान्तर में जब हिन्दू सिकुड़ने लगे तब उन्हें अहसास हुआ कि इस प्रकार काम नही चल सकता। इसके बाद उन्होंने अपने धर्म के प्रति बचाव का नज़रिया अपनाना शुरू कर दिया। इसी मनोदशा का उदाहरण बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में देखने को मिल रहा है।

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संस्कृत के प्राध्यापक के रूप में एक मुस्लिम की नियुक्ति को लेकर विश्वविद्यालय में बीते कई दिनों से विरोध प्रदर्शन हो रहे है। फिरोज़ खान नाम के शिक्षक से संस्कृत पढ़ने को छात्र तैयार नही है। छात्रों का मानना है कि संस्कृत पढ़ाने वाला कोई हिन्दू ही होना चाहिये। इस विवाद से फिरोज़ खान भी दुखी नज़र आ रहे है। फिरोज़ का धर्म के आधार पर विरोध करने वाले सोच रहे है कि वो धर्म की रक्षा कर रहे है लेकिन गहराई से सोचें तो वो धर्म को नुकसान ही पहुँचा रहे है।

हजारों में कोई एक मुस्लिम संस्कृत की तरफ आकर्षित होता है और उसका जानकार बनता है। लेकिन उसका भी इस तरह विरोध होगा तो कौन पढ़ना चाहेगा फिर संस्कृत? फिरोज़ खान को देखकर अगर अन्य मुस्लिम भी संस्कृत की तरफ रुझान रखते तो इससे भला धर्म को क्या नुकसान होता? हिन्दू खुद तो संस्कृत और संस्कृति से भाग रहे है और कोई दूसरा सीखकर आया है तो उसका भी विरोध कर रहे है? ये कैसी धर्मरक्षा है? हिन्दू धर्म का आशानुरूप विस्तार ऐसी छोटी सोच की वजह से ही नही हो पाया है।

आज एक फिरोज़ खान को संस्कृत की वजह से सम्मान मिलेगा तो कल को सौ फिरोज़ संस्कृत सीखना शुरू करेंगे लेकिन हमने अपने धर्म में रुचि रखने वालों के लिए सभी द्वार पहले ही बंद कर रखे है। हिन्दू खुद मज़ारों, गिरिजाघरों में जाकर मत्थे टेक आएगा लेकिन अपने मंदिरों में किसी अन्य धर्मावलम्बी के प्रवेश पर हम भौंहे तिरछी कर लेते है। हिंदुत्व के सिकुड़ने को लेकर ऐसी कुंठित मानसिकता ही जिम्मेदार है।

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फिरोज़ खान प्रकरण के बहाने हम आईना देख सकतें है कि हमसे गलतीं आखिर कहां हो रही है? हमें धर्म का विस्तार करने कहीं जाना नही है लेकिन जो खुद हमारी तरफ चलकर आ रहे है, उन्हें आगे बढ़कर गले लगा ही सकतें है। इस तरह छोटे-छोटे मुद्दों पर विरोध करके हम हिंदुत्व की छवि पर धब्बे ही लगा रहे है। संस्कृत के शिक्षक के रूप में फिरोज़ खान का मुक्त सोच के साथ स्वागत किया जाना चाहिये। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय जैसी गरिमामय संस्था को कलंकित करने के कुप्रयास तत्काल बंद किये जाने चाहिए।

– सचिन पौराणिक

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