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Talented View : मुफ्तखोरी का गुरुकुल JNU

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आज के दौर में मध्यवर्ग के समझदार लोग ज्यादा बच्चे पैदा नहीं करना चाहते, तो इसकी सबसे बड़ी वजह बढ़ती महंगाई है। बच्चों की पढ़ाई का खर्चा इतना ज्यादा हो गया है कि लोग सोचते हैं कि एक को ही अच्छे से पढ़ा-लिखा ले वो ही बहुत है। उच्च शिक्षा की छोड़िए, बच्चों के प्लेस्कूल और नर्सरी की फीस सुनकर ही आपके पैरों तले जमीन खिसक सकती है। कई स्कूलों में नर्सरी की फीस ही लाख रुपये पार जा रही है।

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लेकिन इन सबके बीच जेएनयू के छात्र आज भी लगभग मुफ्त में दिल्ली जैसे महानगर में अपनी उच्च शिक्षा पूर्ण कर रहे हैं। 10 रुपये महीने में कमरा, मुफ्त के भाव खाना और बिना फीस के पढ़ाई करना जेएनयू की हक़ीक़त है। समझ नहीं आता जब देश के आईआईटी, आईआईएम, मेडिकल शिक्षा की फीस जब लाखों रुपये में है तो जेएनयू वाले कौड़ियों के भाव पढ़ाई करवाकर देश के करदाताओं का अपमान क्यों कर रहे है?

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जरूरतमन्दों, होनहार छात्रों को मदद मिले, छात्रवृत्ति मिले इसमें कोई विरोध नहीं, लेकिन सभी को खैरात बांटने का क्या तुक है? कन्हैया कुमार, शेहला रसीद जैसे अधेड़ उम्र के तथाकथित छात्र इस यूनिवर्सिटी में दशकों तक पड़े रहे और ऊपर से भारत के टुकड़े होंगे के नारे लगाये तो किस काम की ये मुफ्त शिक्षा? और ऐसा तो है नहीं की देशभर के जरूरतमंद छात्र सिर्फ जेएनयू में ही पहुंचते हैं। हर यूनिवर्सिटी कमजोर तबके के छात्रों को प्रोत्साहन देती है, लेकिन जेएनयू में मुफ्तखोरी की सभी हदें पार हो गयी है।

10 रुपये महीने की फ़िस को 300 रुपये कर दिया तो कल छात्रों ने यूनिवर्सिटी में बवाल काट दिया। हिंसक छात्र पुलिस से भी भीड़ गए। इन मुफ्तखोर छात्रों का पक्का इलाज़ बहुत जरूरी हो गया है। पुलिस को सख्ती के साथ इनसे निपटना चाहिए। पढाई की जगह बवाल काटने वालो को छात्र मानना भी नहीं चाहिये। देश की राजधानी में छात्रों की इस तरह की गुंडागर्दी नाकाबिले बर्दाश्त है। गुंडागर्दी, देशद्रोह के नारे और करदाताओं के पैसों पर अय्याशी जेएनयू की पहचान बन गयी है, जिसे मिटाना होगा।

फीस में बढ़ोतरी देर से लिया गया एक सही कदम है। लेकीन ये बढत मामूली है। जेएनयू की फीस देश की बाकी युनिवर्सिटी के बराबर होना चाहिये। देश का ईमानदार करदाता अपने बच्चे की अच्छी प्राथमिक शिक्षा के लिए तरसे और उसी के पैसों पर जेएनयू के ये नकारे छात्र दशकों तक मौज काटे, ये बिल्कुल गलत है। असमानता की इस खाई को भरना बहुत जरूरी हो गया है। जो गरीब छात्र आईआईटी-आईआईएम की फीस भर सकता है वो जेएनयू की फीस भी भर ही देगा। इसमें इतना हंगामा करने की कोई जरूरत ही नहीं है।

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हंगामा करने वाले छात्रों पर यूनिवर्सिटी अपने स्तर पर कार्यवाही करे और जरूरत पड़े तो पुलिसिया कार्यवाही भी छात्रों पर होना चाहिए। छात्र अगर गुंडागर्दी पर उतर आए तो उन पर कार्यवाही भी गुंडों वाली ही होनी चाहिये। छात्र और पढ़ाई की आड़ में गुंडागर्दी बर्दाश्त नहीं की जा सकती। जिस छात्र को बढ़ी हुई फीस से दिक्कत है उसको कोई सस्ती यूनिवर्सिटी देखकर उसमे दाखिला ले लेना चाहिए। जरूरतमंद, होनहार छात्रों की मदद जरूर हो लेकिन साथ ही बाकी छात्रों को मुफ्तखोरी की खतरनाक आदत से बचाना भी सरकार की ही जिम्मेदारी है। यूनिवर्सिटी प्रशासन और सरकार को छात्रों की अनुचित मांग के आगे हरगिज़ नहीं झुकना चाहिए।

    – सचिन पौराणिक

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