Talented View: ख़त्म होती बीजेपी

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झारखंड के नतीज़े (Cartoon On Jharkhand Election Results) लगभग साफ़ हो चुकें है। ये नतीजे चोंकाने वाले नही बल्कि उम्मीद के मुताबिक ही नज़र आ रहे है। आदिवासी बहुल राज्य में गैर आदिवासी मुख्यमंत्री बनाने का भाजपा का दाव उल्टा पड़ता नज़र आ रहा है। हालांकि जाट बहुल्य हरियाणा में गैर-जाट मुख्यमंत्री बनाने का भाजपा का दांव सही लगा था। मनोहरलाल खट्टर (Manoharlal Khattar) दुबारा हरियाणा के मुख्यमंत्री चुनकर आ गए लेकिन रघुवरदास ऐसा नही कर पाये।

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आंकड़े अभी स्पष्ट होना बाकी है लेकिन जो तथ्य सामने आ रहे है (Cartoon On Jharkhand Election Results) उससे ये लगता है कि विरोध की लहर के बावजूद भाजपा ने अपना वोटबैंक सुरक्षित रखा है। लोकल मुद्दें राष्ट्रीय मुददों पर हावी हो गए जिसका खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ा। चुनावी विश्लेषक एक साल में भाजपा के हाथ से 5 राज्य खिसकने की बात कर रहे है। छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र के बाद झारखंड भाजपा के हाथ से निकलने वाला पांचवा राज्य बनता लग रहा है।

लेकिन गहराई से आंकड़ो पर गौर करें तो भाजपा सिर्फ छत्तीसगढ़ और राजस्थान में ही हारी हैं। मध्यप्रदेश में कुल मतों का प्रतिशत देखें तो भाजपा कांग्रेस से ज्यादा वोट लेकर आयी है। लेकिन ये वोट सीटों में नही बदल सके इसलिए कमलनाथ प्रदेश के मुख्यमंत्री है। महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन बहुमत जनादेश लेकर भी सरकार नही चला पाए। एक राज्य निश्चित भाजपा के हाथ से फिसला लेकिन इसे इस परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की भी जरूरत है।

झारखंड (Cartoon On Jharkhand Election Results) की बात करें तो यहां भी भाजपा के मत प्रतिशत में कोई खास फर्क नही आया है। सहयोगी दल आजसू के साथ चुनाव से पहले गठबंधन टूटना और राज्य की जनता में असंतोष भाजपा के पिछड़ने की मुख्य वजह है। लेकिन राज्य के चुनाव को केंद्र सरकार के निर्णय पर स्वीकृति या अस्वीकृति के तौर पर नही देखा जा सकता। कई जानकर इस नतीजे को नागरिकता कानून से जोड़कर देख रहे है लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि ये जनादेश केंद्र के कार्य पर नही राज्य सरकार के कार्य पर दिया गया है।

मध्यप्रदेश में कमलनाथ को मुख्यमंत्री (CM Kamal Nath MP) बनाने वाली जनता ने कुछ महीनों बाद लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया था। उड़ीसा में एकसाथ हुए राज्य और केंद्र के चुनाव में भी जनता ने दोनो जगह अलग निर्णय सुनाकर अपनी परिपक्वता का संदेश दिया था। ईसलिये अगर कोई ये गलतफहमी न पालें की जनता ने केंद्र के निर्णयों को नकारा है। जनता बहुत समझदार हो गयी है, वो जानती है कब किसे चुनना है और कब किसे नकारना है।

बहरहाल, ये घड़ी विपक्ष के लिए खुशी मनाने की और भाजपा के लिए आत्मपरीक्षण की है। भाजपा को अति आत्मविश्वास से निजात पाना होगी और विपक्ष को भी अपने नकारेपन से उबरना होगा। उन्हें इल्म होना चाहिए कि ये जीत उनकी जीत से ज्यादा भाजपा की हार है। भाजपा के विजय रथ को झारखंड में फिर एक बार रोकने पर विपक्ष के नेताओं के चेहरे खुशी से दमक रहे है जबकि भाजपा वाले निराशा में डूबे हुए है। लोकतंत्र में हार-जीत चलती रहती है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ये सब जरूरी है।

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           – सचिन पौराणिक
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