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Talented View : जनता के हितों का ध्यान रखना सरकार की जिम्मेदारी

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मोदीजी ने कहा था, “देश में इतने अच्छे दिन आ गए हैं कि हवाई चप्पल पहनने वाले भी हवाई यात्रा करने लगे हैं।” इस बात को कहे काफी समय बीत गया, लेकिन अब हालात ऐसे हो गए हैं कि हवाई जहाज उड़ाने वाले भी हवाई चप्पल पहनने को मजबूर हो गए हैं। जी हां, जेट एयरवेज़ की उड़ानें बंद होने से देश की उड़ान सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हो गई हैं। लंबे समय से घाटे में चल रही जेट ने जैसे ही अपनी सभी उड़ानें अनिश्चितकाल के लिए बंद करने की घोषणा की, बाद उसके कर्मचारियों में मायूसी छा गई। घरेलू यात्रा करने वाला मध्यम वर्ग भी जेट की अचानक बंद हो चुकी सेवाओं से सदमे में आ गया।

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जेट के बंद होने का व्यावहारिक दुष्परिणाम यह निकला कि घरेलू उड़ानों के दाम एकाएक आसमान छूने लगे। इंदौर से दिल्ली की जो फ्लाइट आसानी से 3 से 4 हजार रुपए में उपलब्ध थी, उसके दाम जेट के बंद होने की वजह से 9 हजार रुपए तक जा पहुंचे। जेट में पहले से टिकट बुक करवाने वाले और अन्य एयरलाइन्स में तत्काल टिकट बुक करवाने वालों को इससे बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है। इंदौर हवाई अड्डे से उड़ानों की संख्या में भी काफी कमी दर्ज की गई है। जेट की शुरुआत नरेश गोयल ने की थी, जो एक समय दिल्ली में ट्रेवल एजेंट हुआ करते थे। अपने धंधे को बढ़ाने के उद्देश्य से गोयल ने खाड़ी देशों में और भारत की राजनीति में अपने संबंध बनाने शुरू किए। कुछ ही समय में एविएशन सेक्टर को समझने में गोयल कामयाब हो गए। गोयल का खुद की एविएशन कंपनी खोलने का ख्वाब 1991 में पूरा हो गया, जब उन्होंने एयर टैक्सी के रूप में जेट एयर की शुरुआत की।

महज एक साल के भीतर ही गोयल ने 4 जहाजों का एक बेड़ा बना लिया। इसके बाद गोयल ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। शरद पवार जैसे राजनीतिक दोस्तों और खाड़ी देशों से फंडिंग के बूते जेट ने बहुत जल्द अपना कारोबार फैलाया। विदेशों में भी जेट की उड़ानें शुरू करने के उद्देश्य से गोयल ने ‘एयर सहारा’ नाम की कंपनी को 2007 में 1450 करोड़ में खरीद लिया। इस फैसले को उनकी सबसे बड़ी गलती के तौर पर देखा गया। 2007 के बाद से ही जेट की उलटी गिनती शुरू हो गई। इधर, जहाजों का ईंधन महंगा होने लगा और अंतरराष्ट्रीय मंदी के कारण कोई विदेशी निवेशक जेट में और पैसा लगाने को तैयार नहीं हुआ। इसके बाद 2012 में इंडिगो ने जेट से घरेलू उड़ानों का शेयर भी छीन लिया। जेट के लिए कहीं से कोई अच्छी खबर नहीं आ रही थी। इस बीच जेट की फंडिंग पर भी सवाल उठने लगे। आरोप लगे कि दाऊद इब्राहिम का पैसा जेट में लगा है। एक पत्रकार जोसी जोसेफ ने अपनी किताब ” ए फीस्ट ऑफ वल्चर्स” में भी इन आरोपों को हवा दी, लेकिन दुबई की एविएशन कंपनी एतिहाद द्वारा जेट के 24% शेयर खरीदने के कदम से जेट को पुनर्जीवन मिल गया।

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हालांकि इस कदम के बाद भी जेट अपनी माली हालत दुरुस्त नहीं कर पाया। सरकारों के उदासीन रवैये ने भी जेट की मुश्किलें बढ़ाई। इन हालातों में नरेश गोयल ने भी जेट के चेयरमैन पद से इस्तीफा दे दिया और जेट को अपने हाल पर छोड़ दिया। अब जेट के हजारों कर्मचारियों और उसमें यात्रा करने वाले मुसाफिरों को तमाम दिक्कतें आनी शुरू हो गई है, लेकिन कोई कुछ नहीं कर रहा है। सरकार के नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने भी इस ओर आंखें मूंद रखी है। जेट जिस तेजी से ऊपर गया, उसी तेज़ी ने वापस नीचे भी आ गया। यूपीए-2 के दौरान जब एनसीपी के प्रफुल्ल पटेल के पास नागरिक उड्डयन मंत्रालय था, तब जेट को बैंकों से मोटा ऋण भी मिला और घरेलू उड़ानों के फायदेमंद स्लॉट भी, लेकिन 2014 में सरकार बदलने के साथ ही जेट के बुरे दिन शुरू हो गए। सारे फायदेमंद स्लॉट्स जेट से छीनकर फिर से एयर इंडिया को दे दिए गए और जेट का घाटा बढ़ता चला गया। अब जेट के कर्मचारी जगह-जगह प्रदर्शन कर अपनी तनख्वाह मांग रहे हैं, लेकिन जेट ने अपने हाथ खड़े कर दिए हैं।

इस मामले में सरकार का रवैया भी ढुलमुल रहा। नरेश गोयल के इस्तीफे के बाद से सरकार जेट को अपने हाथों में लेकर इस कंपनी और देश की एविएशन इंडस्ट्री की सेहत सुधार सकती थी, लेकिन ऐसा नही हो सका। अब जेट के जहाजों को फिर से आकाश देखना है तो 2 ही विकल्प बचे हैं। पहला यह कि जेट को कोई बड़ा खरीदार मिल जाए, जो इसका घाटा भरकर फिर से विमान उड़ा सके या फिर दूसरा विकल्प यह है कि जेट को सरकारी मदद मिले।

दूसरे विकल्प की उम्मीद कम है, लेकिन यह ज़रूर हो सकता है कि अम्बानी जैसा कोई धनबली एविएशन इंडस्ट्री में आने के लिए जेट को खरीद ले। जेट की कहानी में और भी कई पेंच हैं, जिनका जिक्र फिर कभी करेंगे, लेकिन देश के एविएशन सेक्टर को जेट की ज़रूरत है। इस तरह एकाएक उड़ानें बंद हो जाने से यात्रियों को काफी समस्याएं आने लगी है। जेट मामले में सरकार को हस्तक्षेप करके परिस्थितियों पर काबू पाना चाहिए।

यह बात सच है कि किसी निजी कंपनी के बंद होने पर सरकार की जिम्मेदारी नहीं रहती, लेकिन जेट का बंद होना एविएशन क्षेत्र के लिए एक बड़ा झटका है, जिसकी कीमत आम आदमी को भी चुकानी पड़ रही है। जनता के हितों का ध्यान रखना सरकार की जिम्मेदारी है। घरेलू उड़ानों को हवाई चप्पल पहनाने वालों की जद में फिर से लाने के लिए ज़रूरी कदम शीघ्र उठाने पड़ेंगे।

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