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मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

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अपने यहां अक्सर गंगा-जमुना संस्कृति की चर्चा चलती रहती है। कई बार हिन्दू महिलाएं-पुरुष भी इसी साझी संस्कृति के चलते अपने मुस्लिम साथियों के साथ रोज़े रख लेतें है। ऐसी तस्वीरों को धर्म-निरपेक्षता की आदर्श तस्वीर समझा जाता है। कई मुस्लिम भी इसी संस्कृति के चलते कांवड़ियों को फलाहार कराते है और हिन्दू यात्रियों की सेवा करतें है। ऐसा ही होना भी चाहिए। क्योंकि जब हम एक-दूसरे के धर्म-मजहब का आदर करतें है तब दोनों समुदायों के बीच की दूरियां सिमट जाती है। लेकिन कट्टरपंथी ताकतें ऐसा हरगिज़ नही होने देना चाहती। वो हमेशा यही चाहती है की दोनों समुदाय आपस मे लड़ते-झगड़ते रहे।

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अपना उल्लू सीधा करने के लिए ये लोग दोनो समुदायों को लड़ाकर ही रखतें है। ऐसी मानसिकता की ताजा बानगी बंगाल में देखने को मिल रही है। बंगाल में एक मुस्लिम महिला को सिर्फ इसलिए धमकियां दी जा रही हैं क्योंकि वो हनुमान चालीसा के एक कार्यक्रम में सम्मिलित हो गयी थी। इसके अलावा वो महिला भाजपा से जुड़ी है इसलिए भी वो मजहबी उन्मादियों के निशाने पर आ गयी है। इशरत जहां नाम की एक भाजपा कार्यकर्ता ने एक सार्वजनिक हनुमान चालीसा के कार्यक्रम में भाग लिया था। हमारे धर्म निरपेक्ष देश में ऐसा होना समाज के हित मे है। लेकिन कट्टरपंथी ताकतों ने इसके बाद इशरत का जीना हराम कर दिया है। उन्हें अपना घर छोड़ने के लिए कह दिया गया है और इसके अलावा उन्हें जान से मारने तक की धमकियां मिल रही हैं।

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गौरतलब है कि इशरत तीन तलाक के खिलाफ भी लड़ाई लड़ रही हैं। सुप्रीम कोर्ट तक तीन तलाक मामले को ले जाने वालों में इशरत जहां भी शामिल हैं। लेकिन सवाल यह है कि अगर कोई हिन्दू महिला किसी मुस्लिम कार्यक्रम में शामिल होती तो क्या उसे भी ऐसी ही धमकियां दी जाती? जवाब है- नही। क्योंकि रोज़ा इफ्तारी की सैकड़ों तस्वीरें हम हर साल देखतें हैं जिसमे हिन्दू समेत अन्य धर्म की महिलाएं भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती है। उन्हें कभी किसी ने नही धमकाया। लेकिन इशरत समेत आए दिन होने वाले घटनाक्रम को देखकर लगता है कि मुस्लिम समुदाय कट्टरपंथी ताकतों से जकड़ा हुआ है।

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अपने समाज की महिलाओं के प्रति इनका दृष्टिकोण आज भी दकियानूसी ही है। हिन्दू महिला रोज़ा रखकर भी जहां खुशी से घर लौट आती है वहीं मुस्लिम महिला को हनुमान चालीसा के नाम पर प्रताड़ित किया जाने लगता है। ये मामला राष्ट्रीय मीडिया में आ गया है इसलिए उम्मीद है कि इशरत को न्याय मिलेगा और वो सुरक्षित रह पाएंगी। अन्यथा अगर ये मामला मीडिया में नही आ पाता तो इशरत के साथ क्या हो सकता था इसकी कल्पना भी नही की जा सकती। कट्टरपंथियो की इस सोच का मुकाबला मुस्लिम समाज को एकजुट होकर करना पड़ेगा। ऐसा नही होने की सूरत में देश की गंगा-जमनी संस्कृति को बचाना नामुमकिन हो जायेगा।

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